भाषीटीकासहितं । (*३ } अथातिगण्डयोगजतफलम् । सदामदोऽथो गलरुसरोषो विशालहस्तारितीव धूर्तः । कलिप्रियो दीर्घहनुर्मनुष्यः पाखण्डिकः स्यादतिगंडतःi३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें आतिगंडनाम योग योय वह मनुष्य हमेशा अभिमान सहित गढी बीमारीवाला क्रोधसहित त्रिशछहाथ पैरोंवाला अत्यंत धूतं कुछइ निस पारी बड़ी टोदी वाला पाखंडी होता है ॥ ६ ॥ अथ सुकर्मयोगजातफलम् । हृष्टः सदा सर्वकलाप्रवीणः ससाहसोत्साहसमन्वितश्च ॥ परोपकारी सुतरां सुकर्मा भवेत्सुकर्मा परिसूतिकाले ॥ ७ ॥ जिश्न मनुष्यके जन्मआळमें सुकर्मनम योग होय वह मनुष्य हमेशा बसुन्न चिक्ष सब कलाओंमें प्रवीण श्रेष्ठ पराक्रमी होता है पराये उपकारमें तत्पर श्रेष्ठ कर्म करने वाळा होता है ॥ ७ ॥ अथ तियोगजातफलम् । प्राज्ञो वदान्यः सततं प्रहृष्टः श्रेष्ठः सभायां चपलः सुशीलः ॥ नयेन युक्तो नियमेन धृत्या धृत्याद्वये यस्य नरस्य जन्म ॥८॥ निस मनुष्यके जन्मकाळमें भृति योग होय वह मनुष्य चतुरतयुक्त बळनेवाच्या निरंतर प्रसन्न श्रेष्ठ सभामें चपळ बोलनेवाला श्रेष्ठ शकिचाला नतिसहित नियमका धारण करनेवाला होता है । ८ ॥ अथ शूलयोगजात्तफलम् । नरो दरिद्रामयसंयुतश्च सकर्मविद्याविनयैर्युक्तः ॥ यस्य प्रभूतं यदि शूलयोगो शूलव्यथा तस्य भनेकदाचित्९X निस मनुष्यके जन्मकाळमें शूळनाम योग होता है वह मनुष्य दरिद्ध गैर सहित श्रेष्ठ कर्म और विद्या विनय करके रहित हे उसको कभी कभी गूळकी व्यथा हे हैं । ९ । अथ गण्डयोगजrतफलम् । धूर्तः सुहृत्कार्यपराङ्मुखश्च क्लैरी विशेषात्परुपक्षभात्रः । चेत्संभवे यस्य भवेच गण्डः प्रचंडकोषः पुरुषः प्रदिष्टः १०॥ जिस मनुष्ठके जन्पकालमें मंहनाम योग होता है वह मनुष्य धूर्ज भित्र के फासे त्रि मुख देशका नेवाला कठोरस्वभावधरला बड़े ोधक करनेवाट हैन हैं । e =
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