( ३४ } सकाश्रम शुभ मुनश्चरके बचमको सत्य मानें ॥ २४ ॥ और विधिपूर्वक मूळ और आश्लेष। ज्येष्ठा शति भावकरके बनाये हुये ग्रंथ स्त्रजातकमें सविधि वर्णित हैं जिसको आवश्यकता होय सों लोकमें दे देह स्वःतक खेमराज श्रीकृष्णदसके यहां बंबईमें छपा है । > - अथ मूलपादफलम् । मुलस्त्र पदत्रितये क्रमेण पितुर्जनन्याश्च धनस्य रिष्टम् । चतुर्थपाः शुभदो नितांतं सापें विलोमं परिकल्पनीयम् ॥२५ फ़िस बळकका जन्म पूछनक्षत्रके पाहिले चरणमें होय तो पिताको कष्ट अर दूसर चरणम भावको कई और तीसरे चरणमें धननाश कहना चाहिये और चतुर्थ पाद हमेशा शुभ है । इसनरहं आश्लेषानक्षत्रका उटा फल जानना चाहिये अर्थात् चतुर्थचरषयो पिताका नाश और त मरे इरथमें माताको नाश और दूसरे चरणमें धनको नाश करता है और अश्लेष अंक पहिला चरण शुभ है । २५ ।। अथ विशेषमूलमाह । कृष्णे तृतीया दशमी बलक्षे भूतो महीजार्किबुधैः समेतः ॥ चेचन्भकाले किल यस्य मूलमुन्मूलनं तत्कुरुते कुलस्य ॥२६ दिव स्यायं निशि प्रातस्तातस्य मातुलस्य च । पशून् भित्रवर्गस्य क्रमान्मूलमनिष्टदम् ॥ २७ ॥ तिल एव फत कम कृष्णपक्षको तृतीया, मंगळवार, और दशमी, शनिश्चरवार और अपने यश, बुधबार सहित ड्रोय और मूलनक्षत्र होय ऐसे समयमें जन्मावळ सरश्न सुत; द स कहा है | २६ ॥ दिन, संना, रानि, भातःकालमें जन्म होय तो मम कंग २, मन *: ए भए नभेगको मूळ नष्ट फल देते हैं । २७ ॥ अश्न पुरुषाकृत ठूलाश्लेषाफलमाह । ॐ पैच मुखे पंच स्कंधयोर्घटिकाष्टकम् । सश्च भुजयोर्युग्मं हस्तयोर्ददयेष्टकम् ॥ २८ ॥ शुभं नभै दिशो गुदं प६ जान्वोः पश्चपादयोः। धन्यस्य दुरुपाकारे मूलभ्य फलमादिशेत् ॥ २९ ॥ अत्र ' { - और आक्षेप नक्षत्रको कर्वे हैं मन्ष्याकार स्वरूप बनावे और ' स् में न ने कंधोंमें आठ नं ४ बोंमें आठ और हाथोंमें दो इवयमें अत्र ५ २४ ६ २ मग्में थे श छः नांवमें छ: पैरोंमें इसनरहे पुरुषाकृति भूळ, ३ ५ ॐट हैं और . दी • •
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