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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/५८

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भाषाटीकासहित । ( ३३ ॥ बोऊनवाळाम अष्ट ३९६ निस मनुष्यको जन्मकळमें स्पेष्ठा नक्षत्र होय वह मनुध्य श्रेष्ठ कांति और कीनिं तथा वैभव सहित धनवान प्रताप करके शोभित श्रेष्ठकनिष्ठयाला बोछनेवाखोंमें अष्ट होता है । ५.८ अथ मूलवचारः । मूलं विरुद्धावयवं समूलं कुलं हरत्येव वदंति संतः ॥ चेदन्यथा सत्कुरुते विशेषासौभाग्यमायुश्च कुलाभिवृद्धिम् ।।१९।। निस भनुष्यके जन्मकाळमें अभुक्तमूळ होय तो वह बालक जड़से कुछका नाश करता है। और अभुक्त मूल न होय तो वह सौभाग्य और अयुका बढानेवाछा कुडवी वृद्धि करत)१९ अथ अभुक्तमूलमह । ज्येष्टांत्यघट्कैिका च मूलस्याद्यघटीद्वयम् ॥ अभुक्तमूलमित्युक्तं तत्रोत्पन्नशिशोर्मुखम् ॥ २० ॥ अष्टवर्षाणि नालोध्यं तातेन शुभमिच्छता । तद्दोषपरिहारार्थं शांतिकं प्रोच्यतेऽधुना ॥ २३ ॥ अव अभुकमूल कहते हैं येष्ठा नक्षत्रके अतका एक घड़ी और मूळ नझनके अःि:की एक घड़ी ये दोनों घड़ी अभुक्तमूळ कहती हैं इनमें पैदा हुए बाटकां मुख की २० ॥ शुभकी इच्छा करनेवःळ लः पित ? आठ वर्षतक नहीं देखे तिस अभुक्तभूल जत दे दूर करनेक शांति कहते हैं ॥ २१ ।। अथ मूलशतिप्रकारः । रत्नैः शतैौषधीपूलैः सप्तमृद्भिः प्रपूरयेत् । शतच्छिद्रं घटंतस्मान्निःसृतेन जलेन हि ।। २२ ।। बालकाम्बापितृस्नाने विप्रैः सम्पादिते सति । जपहोमप्रदाने च कृते स्यान्मंगलं ध्रुवम् ॥ २३ ॥ विरुद्धावयवे मूले विधिरेवं स्मृतो बुधैः । मुनीनां वचनं सत्यं मंतव्यं क्षेममीप्सुभिः ।। २१ । अत्र मूछनातशांति कहते हैं नवरत्न से औषधियोंकी जड़ सात मृत्रिम य रके पूर्णकं । स छेदके बड़ेमेंसे निकलते हुए अठकरके ॥ २२ ॥ पैद हुआ बालक झीर भन्दा ः स्नात करें ब्राह्मणके कहे हुए वास्य करके अप, होम, ६न करके निध संद सेरेतः है ॥ २३ ॥ ये विरुद्ध मूलकी वेधि पंडितोंने कही है कस्यापी इ बानमेव

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