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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/४३

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{ १८ ) निस भनुष्यके जन्पकाछमें रौद्रनाम संवत्सर होतौहै वह मनुष्य भयंकर पशुओंका याजनेवा निरंतर विवातत्पर अत्यन्त धूर्त अपयशका भागी दुष्टचित्तवृतवाळा रौद्र स्प होता है - ५४ अथ दुर्मतिवर्षजातफलम् । स्ववाक्यनिर्वाहमहाभिमानः प्रसन्नताहीनतरो नरः स्यात् । कमी प्रकामं दुरितप्रवृत्तियों दुर्मतिर्मुर्मतिवर्षजातः ॥ ६९॥ तिसु मनुष्यके जन्मकळमें दुर्मति संवत्सर होय वह मनुष्य अपने वाक्यका पाठनेवाळा बड़ा अभिनी प्रसन्नतारहित कामी यथेष्ट पापकर्ममें प्रवृत्त दुष्टबुद्धि होताहै ॥ ५५ ॥ अथ सुंदुभिसंवत्सरजातफलम् । नित्यं नरेन्द्रर्पितगौरखः स्याङ्गजाश्वहेमसमन्वितश्च ॥ तौर्यत्रिकप्रीतिरतीव जातश्चेन्मानवो सुंदुभिनामधेये ॥ ९६॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें सुंदुभिसंवत्सर होय वह मनुष्य राजा करके गौरवको प्राप्त इथे और घोड़ा, सुवर्ण धरती सहित गीत वाद्य और नृत्यमें अतीव मीति करनेवाळा अंग है। } ५६ अथ रुधिरोफ़ारिसंवत्सरजातफलम् । आरक्ताक्षः केचिदपि महाकामलाद्यमयानां प्रादुर्भावादति कृशतनुर्जायतेत्यंतरोषः पादईदं भवति कुनखो हस्तयुग्मे यत्रा स्याच्छश्नाडुःखं व्रजति रुधिरोद्भारिजन्मा मनुष्यः ॥९॥ निम मनुष्यके लम्पकालमें रुधिरोद्री संवत्सर होता है वह मनुष्य लाल नेत्रोंवाला कही बड़े मकरके सहित रोग युक्त देइवाळा अत्यंत दुर्बळ देइबाळा बड़ा फोधी और दोनों

  1. ों द्वे दत्र ह्ॐय और हाथोंक भी काळे नवून अन्नसे दुःखको प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥

अथ रक्तद्रसंवत्सरजतफलम् । आचारधर्माभिरतो नितांतं मनोभवोत्कर्षेतरो नरः स्यात् । अन्याधिकत्वं महते न किंचिद्रक्तदिजातोक्षिरुजान्वितश्च।९८॥ ॐय मनुष्हें अभकलमें दि संवत्सर होता है वह मनुष्य आचार और धर्ममें तत्पर स्तै कीौ भरी पड़ी अधिकता नहीं संहनेवलारोगी नेऑवळा होता है ॥ ५८ ॥

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