( ३९० ) क्रिस कम्याके जन्मकालमें चुभ वा चंद्रमा कर्कराशिके हॉय और मंगळके विंशशमें के य तो वह कन्या अपने इच्छानुसार चळनेत्री होती है और धी त्रिंशांशमें बैठे होंगे तो शिल्पकळमें प्रवीण होती है और वृहस्पतिले त्रिंशशिमें बैठे हय तो श्रेष्ठ गुणचाळी होती है और शुकके त्रिंशांशमें हय त पतिमता होती है और शनैश्चरकं त्रिंशांसमें बैठे होंय तो पतिके प्राण लेनेवाली होती है ॥ ११ ॥ अथ श्रीमैशुनयंगमाह । अन्योन्यभागेक्षणगौ सिता, यद्वा सितकी तनुगे धटांशे ॥ कंदर्पशांतिं कुरुते नितांतं नारी नराकारकराङ्गनाभिः ॥ १२ ॥ अव शुभाशुभंयोग कहते हैं जिस कम्यके जन्मकाळमें झुकके नशमें शनैश्चर और नै अरके नवांछमें शुक्र बैठा होय और आपसमें देखते हैंय ( एको योगः ) अथवा जन्मछन सुळा होय उसमें कुंभके नवांशका उदय होय तो वह कन्या नराकार किसी अन्यस्त्रियों को करके अर्थव किसी प्रकारका लिंग उसी कमरमें बैधाकर उस स्त्र द्वारा अपनी कामाग्निकी शांत कराती है ॥ । १२ ।। उअथ कापुरुषयोगः । शून्ये मन्मथमंदिरे शुभखगैर्नालोकिते निर्बले बालायाः किल नायको मुनिवरैः कापुरुषः कीर्तितः ॥ निस कन्याके जन्मकालमें सातवें स्थानमें कोई अझ नहीं होय और शुभग्रह न देखते होंय और सप्तमभाव निर्मळ होय तो उस कन्याको पति बेवकूफ़ आलसी होता है अर्थाव निवमी होता है । अथ क्लीबपतियोगः । जामित्रं बुधमंदयोर्यदि गृहं षण्ढो भवेन्निश्चितं निस कन्या भ्मकाढमें सप्तमभावमें ३ । ६ । १५ । ११ ये शेयें होय तौ उस अन्याका पति नपुंसक होता है । अथ प्रासशीलभतुंयोगः। राशे तत्र चरे विदेशनिरतो द्वचंगे च मिश्रस्थितिः ॥ १३ ॥ और जि8 कन्याके जसमाछमें सप्तमभावमै १ । ४ । ७ । १० ये राशि होय तौ उस अ पति परदेशमें रहता है और जो दिस्वभावराशि सातवें होय ३ । ६ । २ । १२ श्रेय तौ उसकन्यका पनि कमी परवेझ कभी धर रहनेवाळा होता हैं ! १३ ॥
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