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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/४१२

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सातवें भाचसे पतिका वैभव फाइना चाहिये और पंचमभावसे संतान विचा शल्क औ अष्टमानसे वैधव्यदोषक विचार करना चाहिये ॥ २ ॥ अथ ढ्यकृतिर्योगः ढ्यकृतेयगः ३ ५४ लये च चंद्रे समराशियाते कांता नितांतं ¢ , । प्रकृतिस्थिता स्यात् । सद्रत्नभूषासहिताथ }' + सौम्यैर्निरीक्षितौ तौ यदि चारुशीला ॥ ३ ॥ | १० & बिसु स्फीके अन्मकालमें जन्मछम और चंद्रमा दोनों २ । \ ४ । ६ । ८ । १० । २ न रात्रिों में होंय तो वह स्त्री स्रिय प्रकृतिवाद्या होती है और न पूर्वोकयोगोंको शुभग्रह देखते होंय तो बह की श्रेष्ठरल युत आभूषणसुहित ऋीळगी होती है ॥ ३ ॥ अथ पुरुषाकृतियोः । पुरुषहृतियोग: १२ में ,तयोः स्थिति द्विषमाख्यराशौ नारी नराः १९ । कारधरा कुरूपा ॥ पापग्रझलोकनयोग्यात | ४X१०क़ की तौ चेत्कुशीला गुणवर्जितालम् ॥ १ ॥ चे १ ७ ९ | जिस स्त्रके अन्मकाळमें अन्मलान और बंदमा दोनों विषमा शिमें हय १ । ३ । ५ । ७ । ९ १ ११ औ कळल पापीह देखते हय तो वह स्रो पुरुषोंसे आकारवाली बुरे रूपबाळ दृष्टीबाली गुणरहित होती है ॥ ५ ॥ अथ त्रिंशांशवशात्फलम् । लग्नेन्दोर्बलवान्कुजस्य भवने शुक्रस्य खाद्यंशके कन्या स्यादतिनिंदिता सुरगुरोः साध्वी नितांतं भवेत् । दुश्च भूत नथस्य नूनमुदिता सौम्यस्य मायाविनी दासी तिग्भमरीचि मुरुगगनाद्यंशे फलानि क्रमात् ॥ ५॥ जिस कन्याके न्भकाङमें डम वी वंद्मामें न अधिक बैठे होय और मंथश्च रकि