१३८) सृत्युर्न संशयः ७ ॥ इतीरितं तु निर्याणं यवनाचार्येसम तत्र को मीनस्थे यामिनीनाथे भवेदत्र न संशयः ॥ ९॥ इति श्रीदेवलहुँडिराद्धविरचिते जातकाभरणे प्रत्येक राशिस्थचंनिय्यणाध्यायः ॥ २६ ॥ अष भनरगित कुमाऊा निर्यय कहते हैं धनधान् मानी नघतामुहित भी प्रसत्र चित्त होता है पिता माता देवताको पूजन करनेवाला गुरुका भक्त होता है. १ ॥ उदार रूपवान् श्रेष्ठोध और पुष्पैकी माळा करके सुशोभित पाँचवें वर्षमें अळचे भय आठवें वर्षमें की पीड़ा होता है ॥ २ ॥ वाईखवें वर्षमें बड़ी पीड़ा और चौबीसवें वर्षमें पूर्वं यज्ञ करे नब्बेचीकी उमर होती है । ३ । आश्विनका महीना सृष्णपक्ष दितीया तिपि शृइति वार कृत्तिकानाम नक्षत्रमें सायंकाळके समय मृत्यु होती हैं ॥ ४ ॥ यह निर्याणाध्याय यद् नाचार्यको मतको मीनराशिगत चंद्रमा कहा है ॥ ५ ॥ इति श्रीवंशवीस्थगौढवंशावतंसबिछेदयमसादात्मजगैरीपुथराजज्योति षिकपण्डितश्यामळाळकृतायां श्यामसुंदरीभाषाटीकायां सुना दियोगाऽध्यायः ॥ २५ ॥ अथ स्त्रीजातकाध्यायप्ररंभः। यजन्मकालाङ्गदितं नराणां होराप्रवीणैः फलमेतदेव ॥ स्त्रीणां प्रकल्प्यं खलु चेदयोग्यं तन्नायके तत्परिवेदितव्यम् १i जो अन्प्रकाळसे पुरुषको . ज्योतिषशास्र जाननेवाछोंने कहा है सो फळ स्त्रियोंकोभी कहना चहिये जो फळे नियोंके कहने योग्य नहीं है सो सम्पूर्ण फळ लियके स्वामी कइन चाहिये ॥ १ ॥ अथ त्रीणां वैधव्यसौभाग्यसुखसौंदर्याविचारस्थानभाह । ने शशके च वपुर्विचिंत्यं तयोः करौ पतिवैभवानि ॥ सुताख्यभावे प्रसवोऽमगम्यो वैधव्यमस्याः किल कालगेहे ॥२॥ त्रिवेंके जन्मङ्गळमें छों और चंद्रमा देईका विचार करना चाहिये और क्या चंद्रमांसे
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