सामग्री पर जाएँ

पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/४१

विकिस्रोतः तः
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति

भरण } ६ ३ ३ ) कि मनुष्यको जन्मकळमें साधारण नाम संवत्सर होता है वह मनुष्य इधर उधर ने फिरनेमें तत्र लेख क्रियामें कुशष्ट विवेकी क्रोधसहित पवित्र भोगसे संतुष्ट की हैंत हैं } *४ । अथ विरोधकृत्संवत्सरजातफलम् । महेश्वराराधनतत्परः स्यात्कोधी विरोधी सततं बहूनाम् ॥ पराङ्मुखस्तातवचस्यतीव विरोधकृन्नानि च यस्य जन्म ॥६९॥ नेि मनुष्यके तन्मफछमें विरोधकृत्संवत्सर होय वह मनुष्य शिवजीके आरधन करनेमें न्षर युक्क बहुत अनोंडे विरोध करनेवाला और पिताकी आज्ञाचे विमुख होता है । ५९ ॥ अथ परिधावसंवत्सरजातफलम् । विद्वान्सुशीलश्च कलाप्रवीणः सुधीश्च मान्यो वसुधाधिपानाम् । ब्यापारसंप्राप्तमहाप्रतिष्ठः पुमान्भवेद्वै परिधाविजन्मा॥ ४६ ॥ झख मनुष्यके नन्मकळमें परिधावी संवत्सर होता है वह मनुष्य विद्वान सुंदर झीळवा कछऑमें प्रवीण श्रेष्ठ बुद्धिवाला माननीय राजा करके और व्यापारमें बड़ी प्रतिष्ठाको अंग होत } ४६ / अथ प्रमादिसंवत्सरजातफलम् । दुष्टोऽभिमानी कलहानुरक्तो लुब्धः कुटुंबाभिरतश्च दीनः । म्याल्पधीगर्हितकर्मकर्ता प्रमादिजन्मा मनुजः प्रमादी ।४७। शिव मनुष्यले नन्सकाळमें प्रमादी संवत्सर होताहै वह मनुष्य दुष्ट अभिमानी कळहमें अभत रेभं कुरुम्बमें तत्पर दीन थोड़ी बुद्धिवाला बुरे कर्म करनेवाळा होता है ॥ ५७ / अथ आनंदसंवत्सरजाफलम् । म्याद्भरिदारश्चतुरोऽतिदक्षः शश्वत्सुतानन्दभरप्रपूरः ॥ प्राज्ञः कृतज्ञः सुतरां विनीतोऽप्यानंदजातो मनुजो वदान्यः ४८ जिन मनुते अनमकालमें आनंदनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य बहुत स्त्रियोंबाळा के र अत्यंत तु तिर पुत्रकं आनंदसे भरपूर पंडितं कृत निरंतर नम्रतासहित ईं ॥ ४५ : अथ रक्षस्संवत्सरजातफलम्। रस्कभं कलहानुरक्तः संत्यक्तसद्धर्मविचारसारः । क्यविहीनश्च ध्रप्राइसोपि भवेन्नरो राक्षसजातजमा ॥ ४९ ॥

"https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/४१&oldid=171493" इत्यस्माद् प्रतिप्राप्तम्