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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/४०७

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( ३४३) लभर अथ तुलाराशिस्थितचंद्रकृतनिर्याणमह । मान्यः सर्वजनैर्नूनं वस्तुसंग्रहतत्परः ॥ भोगी धर्मपुरः श्री मान्बहुभृत्योविचक्षणः॥१ वापीकूपतडागादिनिर्मितौ सादरः सदा ।। प्राज्ञः सर्वकलाभिन्न नृपणामतिवल्लभः ॥ २ ॥ मधुरान्नरसीतिर्दीिभार्यः पितृभक्तिकृत् ॥ स्वल्पापत्याल्प- बन्धुश्च कृषिकर्मविचक्षणः ॥३॥ क्रयविक्रयसंप्राप्तिर्देवब्राह्म णपूजकः । भार्यावचोनुगामी च सप्तमे देनिजं भयम् ॥३॥ अब तुळाराशिगतचंद्रमाका निर्याण कहते हैं । सब जनोंरके माननीय बस्तुओं के संग्रह में तत्पर होता है भोगी धर्भमें तत्पर बहुत नौकरोंवाया बद्द। चतुर होता है ॥ १ ॥ माधड़ी, कुआँ, ताशा, आदिस्थानोंको बनानेशाळा चतुर संपूर्णकछाओंका आननेवाळा राशाओंको अत्यंत प्यारा होता है ॥ २ ॥ मीठे अन्न और रसोंमें भीति करनेवालू होप वियोंबाळ रिनाक भक्ति करनेवाळा थोडी सेतानाछा थोडे भाइय्वाझा खेती करनेमें चतुर होता है ॥ ३ ॥ क्रयविक्रय करके धन पैदा . झरनेवाळा देवता और ब्राह्मण पूज़नेवाळा चीते द्वचनमें चञ्चनेबळा हो सप्तर्मे वर्षेमें अग्निभय होता है ॥ १ अष्टमे ज्वरजा पीडा द्वादशे च जलाद्भयम् ॥ तरोस्तुरगतः पातः सर्पभीर्वापि विंशके ॥ ९ ॥ एकविंशन्मिते पीडा चंद्र सैम्यग्रहे स्थिते ॥ पञ्चशीतिर्भवेदायुधैशाखस्याद्यपझके ॥६॥सार्थेष्टम्यां भृगोवरे निधनं पूर्वयामके ॥ बुलाराशी स्थिते चंद्रे निर्याणमिति सूचितम् ॥ ७ ॥ आठवें वर्षमें ज्वरकी पीड़ा बारहें वर्ष में जसे भय होता है और वृक्षस वा घोडेसे गिरना सर्वक भय बीसवर्ष की उमरमें कहना चाहिये ॥ ५ ॥ इक्कीसवें वर्षमें पीड़ा होती है जो चंद्र. मको शुभमह देवते हेंय तो पचासीवर्षकी उमर कहना वैशाखमास्के कृष्णपक्षमें ॥ ६ ॥ आश्लेषानक्षत्रमें शुकवारको पाइॐ पहरमें मथु होती है । ७ * अथ वृश्चिकराशिस्थितचंद्रमिय्र्याणमाह । परतापपरः क्रोधी विद्वेषी कलहप्रियः । विश्वासघातकफ ऽपि मित्रद्रोही विचक्षणः ॥१॥ असंतुष्टो नृपैः पूज्यो विन् कनन्यकर्मणि ॥ शुभलक्षणसंयुक्तो गुप्तपापश्च विक्रमी॥२॥