( ३३२ ) जातभरण ५ से मुथना चाहिये न बुध बैशा होय तो भी ५ से गुयना और जो घुइपति बैठा होये ततो उस गुपे हुए कलापिंडको १० से फिर गुणना चाहिये और जो शुक बैठाय तो सतसेि गुथना चाहिये जो शनैधर बैठा होय तो वहशिके गुणकांकोंसे गुण्यहुआ ने कछऍड फिर उसको १ से गुणना चाहिये ॥ ३ ॥ ४ ॥ राशिगुणककचक्रम्. | मे . a | मि. क. सि. | क | तु { यू. | ध. | म, | के. मं. राशि. ७ १० \ ८ ५ | १० | ५ | ७ | ८ | ९ | ५ | ११ | १२ गुणक अथ ग्रहणूककचक्रम् । ग्रहद्वयं वा बहवो विलग्ने तदा तदीयैर्णकैश्च गुण्याः ॥ एवं कृते कर्मविधानयोग्यो राशिःपृथक्स्थः परिरक्षणीयः। ५ ।। जे मग़फाळकी उनमें दो अथवा तीन या बहुत से ग्रह हे होंय तो हुए गुणक कसे वांरवार उस कळाठिंडको गुगना चाहिये इसीतरह के अंकोंस गुणा हुआ कळापिंड फिर प्रही अंकोंसे गुणा हुआ कश्चापॅिड कर्मविधान की हुई राक्षीके सणे अंकको अछग एकजगह बड़ी रक्षाके साथ स्थित करना चाहिये ॥ ५॥ अथ ग्रहगुणकांकचक्रम्. स ; नं. j सं. j छ. शू. } - झ. ग्रह. ५ ९ ५ ८ | ५ | १० | ७ | ५ | गुणकां”. अथ नक्षत्रश्नमह । पृथक्स्थराशिर्मुनिभिर्विनिम्नस्त्वायेकाणे नत्र ९ युक् द्वि तये । यथास्थितोयं नव ९ वजितये भसंज्ञयातो हि विशेषमृक्षम् ॥ ६ ॥ और न कर्मविधन करी हुई राशि अर्याच कळपिंड बनाकर राशिके अंफोंसे गुणी
- और ग्रहोंने अंग्रे गुणी न राशि बसूझ खातसे गुनर न उनमें पहिलनेकाणि
है तो उसमें १ ॐा और जो इना चाहिये और जो मध्प द्रेष्काण ।तो छप