- ... - 10 --------------- भाषाढीकासहित ( ३४९ / ई त्रिकोणमेपूरणवेश्मगानामंतर्दशा सौख्यमतीव नित्यम् ॥ करोति लाभं विविधं नराणामारोग्यतां मानसमुन्नतिं च ॥ १ ॥ जो ग्रह अष्टमभावमें बैठा हूय उसको अंतर्दशामें रोग होता है और वह नाश खेटे व्यसन होते हैं और न ग्रह छठे बैठा हय उसकी अंतरभमें रोग वृद्धि होती है ॥४॥ और पंचम, नवम, दशम भावमें ओ ग्रह बैठा होय उसकी अंतर्द शमें अत्यंत सख्य और अनेकमकारके लाभ आरोग्यता मानकी उन्नति होती है ॥ ५ ॥ अथ सूर्यमहदशामध्ये चंद्रांतर्दशाफलम् । करोति चंद्रस्तरणेर्दशायां सुवर्णभूषवरविद्रुमाप्तिम् ॥ समुन्नतं मानसुखाभिवृद्धि विरोधिवर्गापचयं जयं च॥ १ ॥ पङ्केरुहेशस्य चरन्विपाके कुर्यान्मृगाङ्को यदि लाभमुधैः ॥ प्रमादमद्यो ग्रहणीं च पाण्डु केम्नांचिदेतन्मतमत्र चोक्तम् ॥२॥ दो सूर्यकी मददशमें चंद्रमाका अंतर होय तो वह मनुष्य सोना और आभूषण मैंग कहे माप्ति सहित ऊँचे मानकी उन्नति अर्थात् बड़े अधिकारको प्राप्त सुखकी वृद्धिसहित शर्वगंसेि जय प्राप्त होता है ।१॥ सूर्यकी द्शमें चंद्रमा अंतरमें पडे तों छाभको मत होत है और जळके प्रमादसे संग्रहणीरोग और पांडुरोगकी पीड़ा होती है जो क्षीणचंद्रमा इव ने ऐ फळ जानना चाहिये यह किसी किसी आचार्यका मत है । २ ॥ अथ सूर्यमहदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् । सत्प्रवालकलचैतसुचैलं मंगलानि विजयं च विधत्ते ॥ मंगलः कमलिनीशदशायां भूमिपालकुलतः किल पुंसः । ३ ।। सूर्यमहदशामें जब मंगळका अंतर होता है तो मनुष्यको शा और सेना श्रेष्ठ बल अनेष मंगळ विजयी प्राप्ति राजाके कुछमें मान होता है ॥ ३ ॥ अथ सूर्यदशामध्ये क्षुधांतर्दशाफलम् । विचर्चिकादह्नविकारपूर्वेः पामामयैर्देहानिपीडनं स्यात् । धनव्ययश्चपि हतोत्सवध विधोः सुते भानुदृशौ प्रयाते ।। ४ ॥ ज़ो सूर्य की द्शमें बुधका अंतर होय तो खुशीक षिक दाद और ड्रोग्डै ६ इंक ; होता है और धनका खर्च ठसह नाशको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
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