( ३४६ ) अथ महादशाफलाध्यायः । दशादृकाणैश्च तनोः क्रमेण स्यादुत्तमा मध्यतमाधमा च ॥ स्थिरे च कष्ट शुभदा च मध्या मिश्रेधमाऽमध्यतमोत्तमा च१॥ अब महादशाका फल कहते हैं ऋगकी द्शा द्रेष्काण करके श्रेष्ठ मध्यम अधम को देती है जो स्थिर रनमें पहिछ। दंष्काण होय तं श्रेष्ठ और मध्यम बैठकाणमें मध्यम और तीसरे दोकाणमें नेष्टफ़छको देती है और द्विस्वभावछसमें पछि देकाण नेष्ट और दूसरा द्रेष्काण श्रेष्ठ और तीसरा ऐकाण मध्यम फळ देता है और चरळममें पहिला दंष्कर्ष मध्यम और दूसरा द्रेष्काण श्रेष्ठ और तीसरा दैण नष्ट होता हैं ॥ १ ॥ शुभानि मध्यानि च निंदितानि फलानि लग्नेशदशोदितानि ॥ तान्येव कल्प्यानि सुधीभिरत्र बलानुमानात्तनुनायकस्य १२॥ संशालते यः किल दिग्बलेन खेटः स्वकाष्ठां पुरुषं च नीत्वा ॥ महाप्रतिष्ठां कुरुते दशायां नानाधनाभ्यागमनानि नूनम् ॥३॥ पहिले अष्ठ मध्यम अधम ये तीनमकारके फळ ओो लग्नशाके कहे हैं सो सब लग्नेशके बळावल करके कहना चाहिये ॥ २ ॥ जो ग्रह दिबळकरके हित होय बह ग्रह अपनी; दशमें बड़ा भारी प्रतिष्ठा और अनेक तरहक धनळाभ कराता है ॥ ३ ॥ विलोमगामिग्रहपाककाले स्थानार्थसौख्यान्यति चंचलानि । प्रवामशीलत्वमतीव जंतोलोके महत्वापचयत्वमेव ॥ ४ ॥ ऋजुप्रयातखुचरस्य पाके सन्मानसौख्यार्थयशःप्रवृद्धिः ॥ षष्ठाष्टमद्वादशवार्जितस्य ग्रहस्य पाकेभिमतार्थासिद्धिः ॥ ६ ॥ न ग्रह वकगति हय उसकी दृशमें स्थान धन सैन्य अतिचंचल होता है और परदेश देको हुन्छ करे और संसारमें बड़ी हानिको माप्त होताहै ! ४ ॥ और मार्दी ग्रहकी ईमें सम्मान और सौख्य धन यशकी वृद्धि होतठे व छठे आठवें बारहवें स्थानसे रहित ग्रकी शrमें में इछा फलको प्राप्ति होती है । ५ ॥ नीचारिभस्थस्य च वक्रिणो वा पाके कुकर्माभिरतिर्मनुष्यः । विदेशवासी निजबंधुवर्गंस्त्यक्तो भवेद्ग्रहताभियुक्तः ॥ ६ ॥
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