भाषाटीकसहित । ( ३३७ } जो मिथुनरामेिं वृइति स्थितहोय ती मनुष्य पवित्रताको आप्त मात्रके गोत्रके पुरुषसे वैको माप्त और के बादकरके विषादयुक्त होता है । ७ ॥ अथ परमोच्चगतशुरुदशाफलम् । वाचस्पतेरुच्चसमाश्रितस्य स्यात्पाककाले कुलराज्यलब्धिः । विशिष्टनाम्ना प्रथितत्वमुचैरुच्चैश्व सख्यं बहुवैभवं च ॥ ८ ॥ को अपने परमोचांशमें पांचअंशके भीतर फर्कराशिगत बृहस्पति बैठाहूय तौ अपनी दशाप्में राज्यको प्राप्ति कराता है और खितवसहित नामको माप्त होता है और क्ड़ानामी बडेमि- यसे मित्रत करनेवाळा बहुवैभव प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अथोच्चच्युतनुरुदशाफलम् । चाचपतेरुच्चसमुत्थितस्य पाकप्रवेशे पितृमातृदुःखी ॥ पृचर्चितद्रव्यपरिक्षयेण तप्तश्च नानाव्यसनाभिभूतः ॥ ९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकळमें वृपस्पति परमोच्च से रहित उच्चराशिमें बैठाहोय तो बह मनुष्य वृद्पतिक दशामें पितामाती दुःख मात्र पट्टिठेका पैदाहुआ धन नाशकरके संतपको मत अनेकपसमों सहित होता है । ९ ॥ अथ सिंहराशिगतगुरुशाफलम् । सिहस्थितस्यामरपूजितस्य पाकप्रवे धनवान्वदान्यः । नृपाप्तमानो ननु मानवःस्याज्जायातनूजानुजजातहर्षः ॥ । १० # न सिंहराशिमें वृहस्पति बृहोय तौ तिसकी दशमें धनवान् श्रेष्ठ होता है राजकरके माभको प्राप्त और स्त्री पुत्र भ्राता करके इर्षको माप्त होता है । १० / अथ कन्याराशिगतरुदशाफलम् । कन्याधिरुढस्य गुरोर्दशायां भवेन्मनुष्यो नृपमानलब्धः ।। कांतासुतावाप्तसुखः कदाचिच्छूद्रादिनीचैः कलहप्रसक्तः ॥११ जो कन्याराशिमें बृहस्पति बैठा होय । अपनी दशमें मनुष्यको राजा सानको भाप सी. पुत्रोंसे सुखको प्राप्त शूद्रादि न च करने कळहको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ अथ तुलाराशिगतगुरुदशाफलम् । तुलास्थम्भोलिभिदिज्यपाके विवेकहीनः प्रमितामभोक्ता ॥ कलत्रपुत्रैः कृतशत्रभावश्चोत्साहहीनो ननु मानवः स्यात् ॥१२॥ न तुलाराशिमें वृहस्पति बैठा होय ही वह मनुष्य विवेकरहित बहुत अमलनेयस की पुत्रोंकरके शत्रुभामको प्राप्त उत्साइरहित होताहै ॥ १२ ॥
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