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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३५८

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भाषीकासहित । { ३३३ अक दुधकी दशाङ्ग। फळ कहते हैं खिद्य और विवेक और अमृत करके इर्दहत्र सनी . काम यज्ञविधान करनेमें चित्तव।ळा बहुत उद्यम के भले कर के पूर्णतको कराता है । ॥ १ ॥ शिलांकिमंमें कुलकी प्राप्ति हमेश उसबकी अनि अष्ट बाऊ और में झील • में रुचि करावे नवीन श्रेष्ठ बर्तन और आभूषण मकान बनदान इंत: १२छुट्छ र वर्तीछाभ करके और हैंसे करके सभयको .व्यतीत करे नद्वानों यह अचाथै और सुनने संमतिको प्राप्त स्त्री पुत्रके सुखकी प्राप्ति होती है। । ये A कफ, वात, पित करके . ङ भारी पीड करावे और धन संग्रह नहीं होता है सुधीर द्शा [में चलाउछ त्रिचर फर सन् न्यू शुभाशुभ पंडितजन विचर करके फल कहैं ॥ ४ ॥ अथ मेषराशेस्थतधशाफलम्। मेषस्थशीतद्युतिशीतपाके नैकत्र संस्थानको नरः स्यात् । स्तेयानृतचूतशठवयुक्तो विमुक्तसौजन्यविधिस्तु निःस्वः॥ ५ ॥ जो मेषराशिमें बुध बैठा होय तौ अपनी में एक जगह स्थिति नहीं कर दो श्रे नुआ और शठताको करावे स्वजनतारहित धहीन कंकराता है । ॥ ५ ॥ अथ वृषराशिस्थितबुधदशाफलम् । वृषाधिरूढस्य जडांशुसूनोर्देशाप्रवेशे व्ययकृन्मनुष्यः । मातुस्सनिष्टश्च कलत्रपुत्रमित्रादिचिंता गलरुग्भयार्तः ॥ ६ ॥ वृषराशिगत बुध स्वशामें मनुष्यको धनका अ कराता है माताको नष्ट फेड करता स्त्रीपुत्रादिकंॉकी चिंताको करावे गठेमें रोग करता है ॥ ६ ॥ अथ मिथुनराशिस्थितबुधदशाफलम् । द्वंद्वधिसंस्थस्य बुधस्य पाके बनेकवार्ता बहुज़रुषकर्ता । दारात्मजज्ञातिसुखोपपन्नो नूनं जनन्याश्च सुखेन हीनः ॥ ७ ॥ जो मिथुनराशिमें बुध बैठा होय तौ अपनी दृशमें अनेक बातें करे वत वकब६ ३ र्स पुत्र और शतिके सुखसहित होय और निश्चय कर माताके सुखसे ईन होते हैं । ७ । अथ कर्कराशिस्थितबुधदशाफलम् । कर्कोश्रितस्यैदुसुतस्य पाके विदेशवासार्पमुखो विरोधी । मिंत्रैश्च सत्काव्यकलाजिताथोंऽत्यर्थं मनुष्यो व्यवसाययुतः ८११ 'न कीराशिमें बुध बैठाहाय त अपनी दशमें परदेशका बस कर भीड़ मुनेछ फेर विरोध कराने और श्रेष्ठ कापसे धनलाभ कराये और बड़े मेघवरूपसर्लिन ड हैं। दे