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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३५

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{ १० ) [भण । अथ दुकानुसंवत्सरतफलम् । अरालकेशः सरलः सुकांतिर्जातारिषज्ञो मतिमान्वितः ॥ प्रसन्नमूर्तिर्विलसद्भूितिः सुभानुसंवत्सरजातजन्मा ॥ १७॥ लेस मनुष्यके जन्म काडमें सुभानु संवत्सर होवे वह मनुष्य हूँघरवा केशोंबाट श्रेष्ठकनिसा रुकुओंको जीतनेवाळा बुद्धिमान नम्रतासहित प्रसन्नमूर्ति शोभायमान वैभव- अदित्र क्षेत्र है । १७ ॥ अथ तारणसंवत्सरजातलम् । धूर्तश्च शूरश्चपलः कलाज्ञः सुनिष्टुरो गर्हितकर्मकर्ता ॥ उत्पन्नभोक्ता द्रविणेन युक्तः स्यात्तारणाब्दोद्भवमानवो यः ॥१८॥ जिस मनुष्यके जन्मकाछमें तारण संवत्सर होता है वह मनुष्प धूर्त और शुरखोर चपळ काओंका जाननेवाला कठोरचित निंदित काम करनेवाळा पैदा कियेका भोगनेवाला औरं वन्युन्त होता है । १८ । । अथ पार्थिवसंवत्सरजातफलम् । स्वधर्मकर्माभिरतो नितांतं सच्छास्त्रपारंगमतामुपेतः । कलाकलापे कुशलो विलासी यःपार्थिवाब्दे कुलपार्थिवस्स्यात्१९ निस मनुष्यले जन्मकळमें पार्थिव संवत्सरह वह मनुष्य अपने धर्म कर्ममें तत्पर श्रेष्ठ आी फरक नानेवाछ कळऑके समूद्दमें कुशल विकास करनेवाळा होताहै ।। १९ ॥ अथ व्ययसंवत्सरातफलम् । सौम्येतिरक्तो व्यसनाभिभूतो भीतोन किंचिद्रहणादृणी स्यात् । जातः पुमानस्थिरचित्तवृत्तिर्यथाभिधाने व्ययकर्मशीलः२०॥ इतिश्च मनुष्यले अनमीळमें व्ययनम संवथ्र तहै वह मनुष्य संख्यमें आसत अर्को र सङ्नि भयको घोड़ा भी नहीं प्रह्ण करनेवाला की वंद चित्तकी ति जिसकी शिप अफ है वर्ष कैनेडल्म हैनहै। ।। २० ।। अथ सर्वजित्संधस्सरतफलम् । गजर्वमहोरसत्रः शुचिमानः पृथुतनुर्महीपतिः। अर्रिवर्गजियोऽतः सदा सर्वजिच्छरदि यस्य संभवः ॥ २१

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