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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३४९

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( ३२४) तकार अथ चंद्रदशाफलानेि । आरोहिणी चंद्रदशा नराणां सर्वार्थसिद्धयै कथिता विशेषात् ॥ तथावरोहात्कुरुते विलंबं सर्वेषु कार्येषु च बुद्धिमान्द्यम् ॥ १ ॥ नक्षत्रनाथस्य दशप्रवेशे भवेन्नराणां महती प्रतिष्ठा । मंत्रित्वमुच्चैर्जुपतेः प्रसादो देवदेवार्चनताप्रवृत्तिः ॥ २॥ सन्मंत्रविद्या विविधा धनाप्तिर्नानाकलाकौशलशालता च । गंधैस्तिलैश्चपि फलैः प्रसूनैर्घनैरलं वा द्रविणोपलब्धिः ॥ ३ ॥ ख्यातिः सुकीर्तिर्विनयाधिकत्वं परोपकाराय मतिर्यश्श्च ।। इतस्ततः संचलनप्रियत्वं कन्याप्रजासंजननं मृदुश्च ॥ ४ ॥ जलस्य कर्मण्यतिसादरत्वमालस्यनिद्राकुलताक्षमा च । कृष्णादिकमभिरुचिः शुचित्वं कफानिलाधिक्यमतीव सवम्” भवेद्विरोधः स्वजनेन नूनं कळिप्रसंगो बहुजल्पता च । चित्तस्थितिर्नव च साधुकायें सामान्यतः कीर्तितमेतदम् ॥ ६॥ अब चंद्रदशाका फछ सामान्य कहते हैं जो चंद्रकी आरोहिणी देश हय तौ सव भकारको सिद्धि विशेष करता है और जो चंद्रमाको अवरोहिणी दशा होय तै कार्यसिद्धिदमें देर करे और सब कामोंमें मंद बुद्धिक करती है ॥ १ ॥ चन्द्रमाकी दशाके । प्रवेशमें मनुष्य बई मतिष्टको माप्त रानाकी कृपा वीर पंद्वीको माप्त ब्राह्मण और देवताओंकी पूजनमें मधृत कराता है ॥२१ श्रेष्ठ मंत्रविद्या और अनेक प्रकारके धनकी प्राप्ति और अनेक करके कटोंमें कुशलताको प्राप्त और सुगंध तिळ फळ पुष्पोंकी वृद्धि और वृक्ष पूर्ण धनी वृद्धिको माप्त होता है।। ३॥ मसिइता श्रेष्ठ कीर्ति नचता अधिक पराये उपकर्में वृद्धि यशको माप्त होय इधर उधर भ्रमण करनेमें फीति और कन्याकी संतानको माप्त कौमळता होती है। ॥और कमरे नीति और तथा निद्रा और व्याकुळता जळके बहुत आछस्य और क्षमाको प्राप्त होता है वतीके काममें मीति पवित्रतायुक्त कफ और वाती अधिकताको मात्र अधिक से प्राप्त ॥ ५ ॥ और अपने जीस वैरको मात्र और छड़ाई करनेवाळा बहुत नेछ अच्छे काम में यिनकी स्थिति नहीं होती यः सामान्य चंद्रमाफी दृश ॐ ह्र वै ॥ ६ ॥ ४