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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३४७

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तदभरणं ( ३ २ २ ) अथ तुलाराशिगतरविदशाफलम् । क्षेत्रात्मजार्थप्रमदासु पीडा चोराग्निभीतिश्च विदेशयानम् ॥ नीचत्वमुच्चैः खलु मानवानां तुलाधरस्थस्य रवेर्दशायाम् ११॥ और न तुलार मेिं सूर्य बैिठा श्रेय तौ अपनी दशमें स्थान और पुत्र तथा धन और लियोंको पीडाकरे और चर तथा अक्षिसे भय करावे और परदेशी यात्रा कराने और नच भावको माप्त होता है ॥ ११ ॥ अथ नीचांशशुद्धरविदशाफलम् । नीव्रांशयुक्तस्य रवेर्दशायां सुखेन लाभः परवंचनञ्च । जायानिमित्ततदुःखलब्धिर्नचैर्भवेत्सख्याविधिर्नितांतम् १२॥ जो सूर्य परम नीच अंशोंशे निकळगया होय तो अपनी दशामें सुख करके लाभ और दूसरोंको ठगने तथा धनका लाभ करे और खोके निमित्तसे दुःख प्राप्त और नीच पुरुषसे मित्रता कराता है ॥ १२ ॥ अथ नीचराशिगताष्टमस्थानरविदशाफलम् । नीचाष्टमस्थस्य रवेर्दशायामुद्विग्नता दोषसमुद्भवः स्यात् ॥ षष्ठाश्रितस्य व्रणजन्यपीडा पित्रोश्च बाधा बहुधावगम्या ॥१३ न नोचराशिगत सूर्य अष्टमभावमें बैठाय तो अपनी दशमें उद्विग्नताको पैदा करता है। और कोच्चराशिगत छठे बैठाहूय तौ मणरोगैकी पीड़ा करावे और पिताको बहुत प्रकार नाथ करता है ॥ १३ ॥ अथ वृश्चिकराशिगतरविदशाफलम् । तेजोविशेषाभियुतो नितांतं विषाग्निशस्त्रैः परिपीडितश्च ॥ पित्रा जनन्यागताचित्तशुद्धिः स्याहृश्चिकस्थस्य रवेर्दशायाम्१४ जो वृश्चिकराशिमें सूर्य पैठाय तो विशेष तेज फरके सहित विष अग्नि शप्तकरके पारैि पीड़ित होता है माता पिता चित्ताधिकारको माप्त होता है ॥ १४ ॥ अथ धनराशिगतरविदशाफलम् । कलत्रपुत्रद्रविणादिसौख्यं स्याद्रौरवं राजकुलाद्विजेभ्यः ॥ संगीतशास्त्रागमसौख्यमुच्चैश्वपोपयातस्य रवेर्दशायाम् ॥ १८ ॥ जो धनराशिमें सूर्य देणाहेय तो अपनी देशामें न पुत्र और धनका सौख्य करावे और राजा कुछसे तथा आह्मणसे गौरखने माप्त करावे और संगीतशास्त्रमें प्रति फरवे बडे सुखको १प्त होना है । १५ ॥