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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३४३

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( ३१८ ) जातर स्वोच्चे स्वगेहे यदि वा त्रिकोणे वगै स्वीयेथ चतुष्टये वा ॥ नास्तंगतो नो शुभदृष्टियुक्तो जन्माधिपः स्याच्छुभदः स्वपाके निस भनुष्यके जम्मकाछमें अपने उच्चमें बा अपनी राशीमें हो या अपने मूळत्रिकोणी ३य बा अपने षट्सर्गमें बैठा होय केंद्र १ । ४ । ७ । १० में स्थित होय न तो अम्तका होय और न पाप ग्रहोंकरके इष्ट होय तौ जन्मपति अपनी दशामें आभ छको देता है ॥ ३ ॥ त्रिषष्ठलाभेषु गतैः समस्तैः सौम्यैः सुखार्थाश्च भवंति बाल्ये ॥ तत्रैव पापैर्वयसत्यभागे जायार्थपुत्रादिसुखानि सम्यक् ॥ ३ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें तीसरे छठे ग्यारहें सब पापग्रह बैठे होंय और शुभ ग्रह दितीय चतुर्थ बैठे होंय ती बाल्य अवस्थामें उस पुरुषको सुख देते हैं और पापग्रह उमरते अन्यमागमें स्त्र धन पुत्रादूिकोंके भळेपकर सुखोंको देते; ॥ ४ ॥ तुंगे स्वगेहे स्वसुहृद्रहांशे नीचारिभस्थेपि च खेचरैवें ॥ मित्रं फलं स्याखलु तस्य पाके होरागमयैः परिकल्पनीयम् । न ग्रह अपने मित्रोंके नन्नशमें बैठे होंय अथवा नवांशमें उच्चैया स्वाक्षेत्रमें बैठे हय और इनमें नीच वा शत्रु राशिमें बैठे हय तौ बह अपनी शमें मिश्रफळको देते; यह ज्योतिषशा साओने कहा है ॥ ५ ॥ वाचांपतिर्लग्नगते स्वर्गे स्वओं दशायत्रिगतश्च सुतौ ॥ करोति राज्यं स्वकुलानुमानं नानाविधोस्कर्षावशेषयुक्तंम् ॥ ६॥ जिस मनुष्यके जन्मकळमें बृहस्पति उसमें अपने उचमें बैठा होय अथवा अपनी राशिमें होय इशमें ग्यारहें तीखेर देशा होय तौ वह गृहस्पति अपनी द्शा में अपने कुछके समान राज्य देता ही अनेक प्रकारकी उत्कर्षतासहित होताहै । ६ ॥ आरोहिणी दशा यस्य खेचरः सत्फलप्रदः । सफलापचयं कुर्याद्दशा चेद्वरोहिणी ॥ ७॥

ग्रह अपनी दचार्शसे ठेकर आगे पंच राशियोंमें वैया होय उस ग्रडूकी दशम आ

इहिणो कहती है वह ग्रहकी दश श्रेष्ठ फलको देतीहै और जो ग्रह अपनी नीचराशिंखे छेर आगेकी पाँच राशिमें बैठ झेय उस ग्रहकी दशा अवरोहिणी कती है वह ग्रह की दश श्रेष्ठ छको देतीहे ॥ ७ ॥