भाषीकसति । { #२३३ निमरणयोः ३३ न त्रिकोणकेंद्रेषु भवंति / पापाः शुभग्रहालोकन- - ई से ४' वर्जिताधेलनोपयाते में ? | सति भास्करे वा निशा | = करे रिष्टसमुद्भवः स्यात् ॥ ३२ ॥ निख बाळकके अन्मकछमें पंचम नवम और केंद्रॉमें पपग्रह बैठे हुएँ उन भ ग्रह नहीं देखते होयें और छनमें सूर्य अथवा । चंद्रमा बैठा होय तौ उस बालकको क्षेत्रही रोग होताहै ॥ ३२ ॥ नवगढ मृत्यूयवेगः ३३ भानुभानुतनयोशनसः स्युश्चेत्प्रसूतिसमये । खलयुक्ताः ।। यद्यपींद्रगुरुणा परिदृष्टा रिष्ट - | में श दास्तनुभृतां नवमेवें ॥ ३३ ॥ जिस बळकके जन्मकाछमें सूर्य और शनिश्चर और शुक पाप- } ग्रहोंकरके युक्त होंय और उनको बृहस्पति नहीं देखना होथ ही { उस बालकको नवमवर्षमें रोग होता है ॥ ३३ ॥ ८ ६ नवमवर्षे मृत्युयगः ३४ ११ किं कामिनीभवनमस्तु हिमांशुर्लनमो मृतिपतिः
- र्था१ शनिदृष्टः रिष्टनवसमाभिरीडितो भूत्-
५शX कज्ञमुनिभिः पुरातनैः ।। ३४ ।। ६८वं N९० | बालकके जन्मकालमें सातवें चंद्रमा वैद्य हय और जिस प्रम अष्टमभावपति जैिसा देवता होय .७९ होय उस शनिश्चर तौ उस बाळकक्षे नवममर्षमें रोग होता है । ४ । दृष्रेिडे नाम दृष्टेंस्यकाले प्रालेयशौ स्यालयं वा विलग्नम् । वीर्योपेतं संगते पापदृष्टे शक्त्या युक्ते मृत्युकालेर्दमध्ये।।॥ ३६ गृहॅ कहे ये रिट्कळमें एकवर्षमें रिष्ट करता है और निस रियोग में सभयका भि नहीं कहा है तिसमें योग करनेवाले प्रहोंने में नौ मह ष हेय तिष्ठतु रक्षशिमें ५६