(९६} भाषाटीकाप्रति । अथ मृत्युयोगः । औद्रस्युः औत्रभृयुयोगः ९ ५३ १२ १० ३ ॥ १३ १११ श , ६ में १० ६ ९ ८ रु में ४ १५ ८ १० ११श मेधूरणेकं धरणीसुतस्य गेहेऽथवाकश्मजधामसंस्थः । पापैरनेकैश्च निरीक्ष्यमाणः प्राणैर्वियोगं स तु याति तूर्णम् ॥ ९॥ जिस अनुष्यके जन्मकालमें दशमभावमें सूर्यं मेष वृश्चिक वा मकर कुंभ राशिमें बैठा होय औौर पापग्रह देखते होंय तो वह बाळक मृत्युको शीनही पातहै ॥ ९ ॥ अथ सप्तमवर्षे मृत्युयोगः । लग्ने भवंति द्रेष्काणः श्रृंखलापाशपक्षिणाम् ॥ सपापा मरणं कुर्युः सप्तवर्युर्न संशयः ॥ १० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें जन्मलनमें निगड़ पाश्च पक्षिदेष्कमण होय और पाप ग्रह भुक्त हृय तो वह बाळक सातवें वर्षमें भरताहै इसमें संशय नहीं है । १० । मीन कके राशिका अंतिम और वृश्चिक राशिकं प्रथम द्वितीय श्रेण निड़ संज्ञ$ है दृष्ट शिका पहिला मकरका पहिला द्वितीय देण पाश कह्तौहै और तुट् राशिक द्वितीय और अंतिम सिंह राशिका पहिला कुंभ राशिका पहिया द्रकाण पक्षिसंज्ञक होताहै। १० ॥ दशक व प + ११ दशकदे षोड़शब्देभ्युद्योगः १९ ॥ राहुर्भवेज्न्मनि केंद्र- ४ | वर्ती क्रूरग्रहैश्चपि निरी- | N |¥ * } क्षितश्चेत् ॥ । करोति वयं - मे ७ वे | देशभिर्विनाशं वदंति वा । । षोडशभिश्च केचिद् ११
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