( २८° } शैठकरुन । अथ वालिपापग्रहफलम् । लुब्धाः कुकर्मनिरता निजकार्यनिष्ठाः साधुद्विषःस्वकुलझाश्च तमोगुणाद्याः ।। क्रूरस्वभावनिरता मलिनाः कृतनाः पापग्र हे बलयुते पुरुषा भवंति॥हौ वा त्रयो वा बलिनो भवंति ल प्रदनवभिति प्रकल्प्यम् ॥ ६ ॥ निस मनुष्यके जन्मकळमें पापग्रह अधिक बळी ह्य वह मनुष्य छोभी स्ट फर्म में तत्पर अपने काममें निष्ठा रखनेवाळा सधुओंक वैरो तमोगुणसहित कूरस्वभाववाला मछिन कृतन होता है मिस मनुष्यके दो वा तीन ग्रइ बळवन हूय तौ पूर्वोक्तं शुभाभ फल कहना चाहिये | ५ ॥ अथ नैसर्गिकेवलमाह । मंदारसौम्येज्यसितेंदुसूर्यो यथोत्तरं स्युर्बलिनो निसर्गात् ॥ ६ ॥ अब ग्रहोंक नैसर्गिक बळ कहते हैं शनैश्चरसे अधिक बळी मंगछ और मंगळसे खुष और बुधसे बृहस्पति और बृहस्पतिसे शुक और शुझसे चंद्रमा और चंद्रमासे आर्थिक बी सूर्य नैसर्गिक बछ पाता हैं । ६ । अथ चेष्टबलयुक्तनद्फलम् । क्वचिद्राज्यं कचित्पूजां क्वचिद्रव्यं चियशः । ददाति खेचरश्चित्रं चेष्टवीर्यसमन्वितम् ॥ ७ ॥ अब ग्रहोंकी चेष बल कहते हैं थोड़ा राज्य और थोड़ी थे थोड़ा धन थोड़ा यसको प्रम हृत है जो चेष्टा वर्यंमें युक ग्रह होयतौ फछको देता है । ७ ॥ अथ दृष्टिबलिप्रहफलम् । दुष्टप्रदः सौम्यनिरीक्षितुदृष्टं फलं नो सफलं ददाति । कॅरेक्षितः सत्फलदोषि चैवं विचरणेयं खलु दृग्बलस्य॥ ८ ॥ इति श्रीदैवज्ञटुंढिराजाविरचते जातकाभरणे स्थाना दियुक्तअहफलाध्यायः ।। १२ ।। अब दृष्टिळो ग्रहोंका फळ कहते हैं जो पुरा फल देनेवा अह शुभभह अरके इष्ट ठोस तो त्रह मनुष्यको पूर्ण हुटु फळ नहीं देता है और पापग्रह देवता होये ौ अच्छे फक़ देनेवाला अहं भी शुभ फछ नहीं देता ये ऽपि अह का विचार करना दिये +Z इति श्रीमंशपेरेज़ीस्थमज्योतिषियपण्डितश्यामळमळतयाँ ईश्वभक्षुद्र भाश कथं स्थगदिक्षग्रहापार्थः + १२ । -- --
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