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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३१

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आलकाभरणं । विल अभपन्नो जिस मनुष्यक नहीं है उस पुरुषको जीवन निरंतर अंधरूप होता है बहुत झेड अस्य फळ नहीं होनपडता है । १८ ॥ जन्मकालतिथिवारतारकथापि योगकरणाः क्षणाभिधाः ॥ मंगलाय किल संतु पत्रिका यस्य शास्त्रविहिता विरच्यते ॥१९॥ ये वक्ष्यमाणा इह राजयोगारभिप्रभूता अपि नाभ साधये कारकाः पूर्णफलं हि पूर्ण यच्छंतु पत्रं क्रियते यदी या ॥ २० ॥ यस्यामलेयं किल जन्मपत्री कुतूहलेन क्रियते यथोक्ता ।। तस्यालये सत्कमला सलीलं सुनिश्चला तिष्ठतु दीर्घकालम् ॥ २१ ॥ कृतं मया नोदकयंत्रसाधनं नृपेक्षणं चापि न शेकुसाधनम् । परोपरिष्टात्समयात्प्रयत्नतः शुभा शुभं जन्मफलं मयोच्यते ॥ २२॥ मसमयका इष्ट और तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण और क्षणळस मंगळके अथे अग्ने तिसकी यह जन्मषत्री शत्रवाईत रचना करते हैं ॥ १९ ॥ जो रानयोग कहे ॐ भूतराईमयोंहित नाभसयोग और पूर्णकारक योग पूर्ण शुभफलको देवें निसकी ये पत्री करते हैं हैं २० जिस मनुष्यकी न्भपत्र कौतुकसे शत्रोत करते हैं उस मनुष्यके घरमें श्र छ→मी अस्वळ नहुन कळतक स्थिर होय ॥२१ मैंने नळयंत्र साधन नहीं किया और न त्रण और न ई सिद्धांतोंसे शंकु जन्मसमयमें छगाकर इष्टसाधन किया पराये जनाये हुए समय करके अनेक अच्छा द्वारा तन्मपत्रक कल में कहता हूं ॥ २२ ॥ अथ संहिताभिप्रायेण पंचाङ्गफलानि निरूप्यंते तत्रादौ संवत्सरफलम् । अथ प्रभवसंवत्सर्जTतर्फलम् । सनृम्तुषग्सिंग्रहे रतः पुत्रसंततिरतीव सन्मतिः ॥ सर्वमेगयुतदीर्घजीवितो जायते प्रभवसंभवः पुमान् ॥ १ ॥ निस युगों तन्मकालमें प्रभव संत्रसर होता है वह मनुष्य सम्पूर्ण वस्तुओंके संग्रह नेत्रे अन् त्रसंतनवाला ‘बृद्धि सर्वकारके भोगसहित बढी उमराठ्य होता है ॥ १ ॥ अथ विमवसंवत्सरजातफलम् । इत्यत्रभोक्ता प्रियदर्शनश्च बलाधिशाली चतुरः कलाक्षः । -- गत् भवेदात्मकुले सुशील विद्वान्मनुष्यो विभवाब्दजन्मा ॥२॥

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