भाषाटीकासदिश । ( २८१ ॥ . जिस भतुष्यके जम्माळमें चीौवाढी– रमिथैका योग होवे बह मनुष्य सुधभीम : राज़ हैiता है उस राजकी फौज घोडा हाथी पैछ और सुदारैति दिशामकं वमथ करनेघाडी हुंका निशान और मत्स्य पतक सहित संग्रामकी इच्छा करनेवाएं: आनंदको हर हुई शत्रुओंको मूर्छित करती है ॥ १७ ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशद्रश्मियोगफलम् । पंचाब्धितत्परतो भवंति गभस्तयो जन्मनि मानवानाम् । ते देवतानामपि दुर्जयाः स्युर्दीपान्तरोदीतयशोविशेषाः ।। ३८ ॥ इति श्रीदैवज्ञदुण्ढिराजविरचिते जातकाभरणं गमि- जातकाध्यायः ।। १० ।। निख मनुष्यके जन्मकाळमें `ताळीस रश्मियोंका योग हो अथवा इससे अधिक होयतौ बह मनुष्य देवताओं करके भी कठिनता से नीतागाय दीपदीप्तरों में उसका यज्ञ गया बात है ॥ १८ ॥ इति श्रीवंशबरीस्थगौडवंशावतंसीक्वमसाद्भशराजज्योतिर्षिपडित- श्यामळळहूतायां श्यामसुंदरीभाषाटीकायां रश्मिशाल काध्यायः । १० ॥ अथ ग्रहाणां दीप्ताद्यवस्थामाह। दीप्तस्तृगगतः खगो निजगृहे त्रस्थो हित हर्षितः शांतः भनवगैगश्च खचरः शक्तस्फुरद्रश्मिभाक् । लुप्तः स्याद्वि कलः स्वनीचगृहगो हीनः खलः पापयुः खेदो यः परिपी डितश्च खचरैः स प्रोच्यते पीडितः ॥ १॥ अब दीप्तादि ग्रह कहते हैं जो ग्रह अपने उच्चमें बैठा होय वह दीफ बहन है और को अपनी राशिमें बैठाहूय वह स्वस्थ कहता है और जो ग्रह मिश्रकी में बैठाय = र्षित कड़ताई और जो ग्रह ग्रहों के शुभवर्ग में बैठा होय दह शांत कहतहै और न गृह षष्ट रणोंवळ होय वहं शक्त कहतहै और जो छह सूर्यकरके अस्त होय वह चिक कहानहै अपनी नीचुरोशिमें बैशाहु ग्रह दीन कताहै और जो पापपूर्ती करने युक होर्थ वइ प्र सर कहाताहै और ग्रहोंकरके पीड़ित होय बढ़ ग्रहे पीड़िद कहताहैं ॥ १ ॥ अथ दीप्तग्रह्फलम् । दीते प्रतापादतितापितारिर्गलन्मंदालंकृतकुंजरेशः । नरो भवेत्तनिलये सलीलं पद्मालयालंकुरुते विलासम् ॥ २ ॥
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