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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/३०३

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( २७८) अथ पंचदशरश्मिफलम् । परं दशभ्यस्तिथयस्तु यावत्ते भानवो मानवमल्पकार्यम् ॥ धर्मप्रियं संजनयंति नूनं कुलानुरूपं सुखिनं सुवेषम् ॥ ३ ॥ मिस मनुष्यले जन्मकाळमें दशसे ठेकर पंद्रह रश्मितक बलयुक्त ग्रह होवें वह मरुप धोड़े धन्वाळा होताहै धर्म निसको व्यारा अपने कुळके समान रूपवळा सुखी श्रेष्ठ चेष वद इतके ॥ ३ ॥ अथ विंशतिरश्मिफलम् । पंचेंदुतो विंशतिरेव यावद्भस्तयस्ते मनुजं सुशीलम् ॥ कुर्वंति सत्कीर्तिकरं सुधीरं वंक्षवतंसं कुशलं कलासु ॥ १॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंद्रह से लेकर बीस पर्यंत रश्मि होय बह मनुष्य ट्वािन श्रेष्ठ कर्निवाल धैर्यवान् अपने वंशमें प्रकाशवान् कठोंमें कुशल होता है ॥ ४ ॥ अथ पंचविंशतिरश्मिफलम्। यम्य प्रसूत च नख मयूखस्तद्भाग्यरेखा सुहृदां सुखाय । पंचाधिका विंशतिरत्र यावत्तावत्फलाधिक्यमनुक्रमेण ॥ ५ ।। जिस मनुष्यके जम्मकाछमें श्रीख वा पचीस पर्यंत रविमं हय सो मनुष्य | मित्रोंके लिये सुख दैवाळा हो क्रमसे अधिक अधिक फ़छ कहना चाहिये ॥ ५ ॥ अथ त्रिंशद्रभिफलम् । यानत्रिंशत्संमिता पंचवर्गा येषां सूतं चेन्मयूखा नराणाम् । भूमीपालात्प्राप्तसौख्याः प्रधाना नानासंपत्संयुतास्ते भवंति।६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसपर्यंत रश्मियां हवे वह मनुष्य राजाकरके सौख्यको सह रानाका दीवान होता है और अनेक संपत्तिसहित होता है ॥ ६ ॥ अथ एकात्रंशद्रश्मफलम् । येषां नूनं मानवानां प्रसूतावेकत्रिंशत्संख्यकान्मयूखः ॥ विख्यातास्ले राजतुल्या प्रधाना नानासेनास्वामिनः संभवंति ७ निम्न मनुष्यके अन्प्रकलमें एकतीस रश्मियो हैं वह मनुष्य सारमें मसिक शतके न न राह यतर अनेक सेमाका स्वामी दूतके ॥ ७ ॥