भाषाटीकासहित । ( २.१३ / भूपः ॥ ९ ॥। करतले यदि यस्य तिलो भवेदविरलः किल तस्य धनागमः । । पदतले च तिलेन समन्विते नृपतिवाह नचिह्नसमन्वितः ॥ १० ॥ प्रसन्नमूर्तिः समुदारता वेश भिमानः शुभवाग्विलासः । अनीतिभीरुर्गुरुसाधुनम्रः सा म्राज्यलक्ष्मीं लभते मनुष्यः ॥ ११ ॥ एतत्फलं राजकु लोद्भवानां स्यान्मानवानां मुनयो वदंति । प्रकल्पयेद्न्यकु लोद्भवानां नूनं तदूनं स्वकुलानुमानात् ॥१२॥ चिह्नानिया नि प्रतिपादितानि व्यक्तानि सम्पूर्णफलप्रदानि ॥ वामेतरेद्धे च करे नराणां धन्यानि वामे खलु कामिनीनाम् ।। १३ ॥ इति श्रीदैवज्ञपण्डितराजाविरचिते जातकाभरणे राजयो गसंगतिसामुद्रिकाध्यायः। ९॥ ४ ॥ ॥ ॥ जिस मनुष्यकी नाक सीधी और छातो शिळा समान और घुड़ी गहरी और छब ऐके पैर होवें वह राना होता है ॥ ९ ॥ निस मनुष्यकी हथकी हथेमें तिलका चिह्न क्षेत्रे, तिसके बहुत धन प्राप्त होती है और निस्के पैरोंके तलुवेमें तिछकाचिह्न हैं और वहन चिह्न हय वह राना होता है । ६० ॥ जो मनुष्य प्रसन्न मूर्ति और उदारथित चळ होय और श्रेष्ठवंशमें पैदा होय अष्ठ वाणी बोटनेन छा अम्पायसे डरनेवालागुरु और क्ष ऑसे नम्र होता है वह राजा होता है। ११॥और राजवंशके विना अन्यकुळमें पैदा होय तो वह अपने वंशके समान रानलक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥ १२ ॥ जो जो चिह्न कहे हैं वह चिह प्रकट दीखपडते वय तो पूल फळ देते हैं पुरुषके दहिने हाथ पैर और स्लिपोंके बौथे हNर्थ पैरेंमें पूर्वोक्त चिह्न श्रेष्ठ फल देते हैं ॥ १३ ॥ = इति श्रीवंशघेरेरीस्थगड़बंशावतंसश्रीबलदेवमसदात्मजौरीपुत्र- ज्योतिषिफपण्डितश्थमळालकृताय श्यामसुन्दरीभाषय्ॐयसँ राजयोगसंमतिसमृदिकाध्यायः ॥ ५ *
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