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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/२७३

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( २४: ) तमरण ३ ।। धनस्थिताः सौम्यसितामरेज्या मंदारचंद्रा । । यदि सप्तमस्थाः॥ यस्य प्रसूतौ स तु पतिः स्यादरांतिदंतिक्षतिसिंह एव ॥ ९२॥ हैं | निस मनुष्पके जन्मकाछमें धनभावमें बुध, शुक, लुइस्ते बैठे हॉये और शनिश्चर, चंद, मंगळ सातवें बैठे होंय वह राजा '===== होता है शत्रुओंका नाश करनेछा जैसे हायियोंको सिंह नाश करता है । ५२ ॥ कुम्भाष्टमांशे शशिनि त्रिकोणे मेषेद्रिभागे धरणीसुतो वा ॥ इंडैकविंशांशगतेथवा दो यस्य प्रमूतौ स तु भूपतिः स्यात् ५३॥ निष्ठ मनुष्यको जन्मकाळमें कुंभराशिके अष्टमनवांशमें चंद्रमः त्रिकोणमें बैठा होय और मेषने सातवें भागमें मंगछ बैठा होय और मिथुनराशेके इक्कीसवें विंशांशमें बुध वैशा होय निसके जन्मकाळमें यह योग होयं वह रामा हतहै ॥ ५३ ॥ कुंभस्य चेत्पंचदशे विभागे की दशांशोपगतो विधुचेत् । तृतीयभागे धनुषद्रवंधः सिंहे शशाङ्गप्यथवापि भूपः ॥ ९४ ॥ जिस भनुष्यके जन्मकाळमें कुंभराशिके पंद्रहवें भागमें और कर्कराशीके दशमभागमें चंद्रमा वैरा झेय और नके तृतीय भागमें बृहस्पति बैठ होय और सिंहके तृतीय भागमें चंद्रमा होय तो वह रामा इतके ॥ ५४ ॥ पुष्येऽश्विभे वाष्यथ कृत्तिकासु वर्गोत्तमे पूर्णतनुः कलावान्॥ करोति जातं खलु सार्धभौमं त्रिपुष्करोत्पन्ननरोऽपि भूपः ॥५३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पुष्य नक्षत्र अथवा अधिनी वा कृत्तिकामें वर्गोत्तम पूर्ण चंदमा बैठा होय इस योगमें उत्पन्न समश्र धरतीका राजा और त्रिपुष्कर होताहै योगमें अत्यन्न मनूष्यभी गल होता है । ५५ ।। तिथिसुमेभदा विषमांघ्रिमे चेद्वारे गुरुमातनयार्कजानाम् ॥ त्रिपुष्करो योग इति प्रदिष्टो वृदौ च हानौ त्रिगुणातिकर्ता॥५३॥ भिक मनुषके अल्मकाळमें भ7 तिथि और नक्षत्रका मथम वा तृतीय चरण होय और गृहस्पति, भंग्य, शनैश्चर आर होंय तो त्रिपुरयोग होता है वृद्धिमें और नाशमें त्रिगुण

  • द्ध करता है इस योगमें इयत्र मनुष्य शण होता है ॥ ५६ ॥