६ ३४२ } जयगः चं.१८प्ले . योगमें उत्पन्न हुआ रानाके शत्रुओं फौण सामनेसे भागजातहै और उन शबुडके यशरूपी वोंको नंगे करदंताहं ॥ २९ ॥ सत्वोपेतः शुभजननपः पूर्णचंद्रं प्रपश्येद्य- २ स्योत्पत्तौ भवति नृपतिनिर्जरातिपक्षः ।। ३३९ - यात्राकाले गजहयरथात्यंततूर्यस्वनानां ब्र }, ह्मांडं नोऽखिलमपि भवेत्पूरणार्थं समर्थम्३०। निस मनुष्यके जन्मलमें जन्मळलका स्वामी बलवान् होवे उस्को पूर्ण बदमा देखताहूय एँखें योगमें पैदा हुऐ राजा शत्रुओंको तिनेवाले होते हैं उन राजाओंकी थानके समय है।" बडे रथोंके अत्यंत शब्दोंकरके सम्पूर्ण ब्रह्मांड पूरित होता है ॥ ३० ॥ राजयोगः ३ वं र १ स्वचषु वाचस्पतिसूर्यशुक्रः शनीक्षितः शी Z\ तरुरुचिर्निजोचे।यद्यनकाले रजसने वितानं ६५ , रुणद्धि सूर्याधविलोचनानि॥ ३१ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाछमें बृहस्पति सूर्य चूक अपने उच्चमें | — उँदै ोंय और चंदभाभी उच राशिगत शनैश्चर करके इष्ट होय ८ ९ \ ११|| ऐसे योगमें पैदा हुए रानाकी यात्राकळमें धरतीको रजकरके सामियाना छथा जाता है और सूर्यके अधीके नेत्रोंको वह रन बंद कर देती है ॥ ३१ ॥ ५२ रजयोगः १ १ नास्ते यतः सुतष्टहगतः सौभ्यशु मरे १) में ज्या नक्रे वक्र रविरहितगो धर्मगो यस्य ४ ॥ मंदः । यात्राकाले किल कमलिनीपुष्पसं डै ६ कोचकर्त श्रीसूर्यापि प्रचलितदलोद्धृतधूली ८१/५ बृतास्तः ॥ ३२ ॥ । जिस मनु यी जन्मकछमें पंचमधबमें बुध श्रुक बृहस्पति बैठे होंय परंतु अस्तंगत न हों और सूर्यसे इति मकरराशिमें मंगळ बैठाय और नवमभावमें शनैश्वर हैप ऐसे योगमें पैदा हुए रानी पत्रके समयमें कमलनी पुष्प संकेचकर्त है अर्थात बंध्इंजाती है और सूर्यनारायणभी इस नाझी फौजके चछनेसे धरती रस के अस्त होत हैं ।। ६२॥
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