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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/२६३

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( २ ३४ ) अतकाभरंग- ५ ४ ॐ मेषे गतो मूर्तिगतः प्रसूतौ वृहस्पतिश्चस्त- ३ १ ५ गतः कलावान् ।। रसातले व्योमगते सित- .३ य | चेन्महीपतिगीतदिगंतकीर्तिः ॥ १५ ॥ ५७ वX| निस मनुष्यके जन्मकाळमें मेषराशिगत बृहस्पति बैठा होय ६ ४८ और सातवें चंद्रमा वैष्ट। होय वा दशम भावमें शुरू और चतुर्थे बैठा होय ऐसे योगमें उत्पन्न सगकी कीर्ति दिगंत व्यापिनी होती है अर्थात् बड़ा अतापी राना होता है । १५ ॥ रणांग ५ मे१ , ३. मुरुः कुलीरोपगतः प्रसूतं स्मारम्खुखस्था >J.२ | भूर्भेदभौमाःतद्यनकाले जलधेर्जलनि ७. भेरीनिनादोच्छलनं प्रयांति ॥ ३६ ॥ १९ २ / | मिस मनुष्यके जन्मकाळमें बृहस्पति कफैरागत उनमें बैठ ११ होय और सातवें शुक और चतुर्थ शनैश्चर दशम मंगळ वैया हर्ष योगमै बन्न . ऐसे हुए राजाकी यात्राको समयमें समुद्र जळ नग।के शसे उछ टूना हैं |} १६ ॥ प्रसूतिकाले स्फुरदंशुजालः षड्वर्गशुद्धोऽदितिभे स्वभे वा ॥ तुङ्गं त्रिकोणे स नभश्चरेंद्रो नरं प्रकुर्यत्वचं सर्वभौममे ॥१७ जिस मनुष्यके जन्मकछमें चंद्रमा षट्सर्गमें शुद्ध होकर पुनर्वसु नक्षत्रका कर्कराशिका त्रा होय अथवा अजराशिगत पंचम नवम बैठा होय वह मनुष्य निश्चय कर समुद्रपर्यंत धर त्रको स्वामी होता है । १७ ॥ षड्वर्गशुद्धौ खचरद्वयं चेद्यथोक्तरीत्या जनने नृपस्य । नम्याधिपत्यं खलु किंनरेषु द्वीपांतरे चात्र न किं धरायाम् १३८॥ क्रिक मनुष्यले जन्मकाळमें षड्वर्गमें शुद्ध दो ग्रह पूर्वोक्त रीनिके समान ठे हय उस

का आधिपत्य किंशके विषं और द्वीपांतरोंमें और पृथ्वीपर होता है ॥ १८ ॥

मुंगत्रिकोणाद्यधिकारीनैः षड्वर्गशुदैस्त्रिभिरेव मंत्री । गज चतुर्भिः खलु सार्वभौमः पंचादिभिर्वाक्पतिनैककेन॥१९॥