( २२८} जातभरण जस मनुष्यके जन्मकछमें उ. इ. श. एकभाधमें बैठे होंय बह मनुष्य मकनमें धन और श्रेष्ठ वैधत्र सहित बहुत बोळनेवाछा धृतिमान् श्रेष्ठ वृत्तिवाळा होत है ॥ ३३ ॥ अध बु० ० शo योगफलम् । साधुशीलरहितोनृतवक्ताऽनरुपजपनमुचिः खलु धूर्तः ॥ दूरयाननिरतश्च कलाओ भार्गवज्ञशनिसंयुतिजन्मा ॥ ३४ ॥ नेिस मनुष्यके जन्मकालमें वुः शु. श. एकराशिमें बैठे हय वह मनुष्य साधु शीलरहित झूठ बोलनेवभळा बहुतबोळनेवाळा निश्चय घृतं बड़ी दूरी यात्राकरनेत्राछ। कछाओंक नमनेवाला ड्रोताहै । ३४ ॥ अथ दृ० शुw श• योगफलम् । नीचान्षये यद्यपि जातजन्मा नरः सुकीर्तिः पृथिवीपतिः स्यात्। सवृत्तिशाली परिसूतिकाले मंदेज्यशुक्रा मिलता यदि स्युः३६ निस मनुष्यके जन्मकाळमें घू. छं. श. एकभावमें बैठे हय वह मनुष्य नीच वंशमें भी चड़े पैद हूय तौभी अष्टकीर्तिवाळा धरतीका स्वामी श्रेष्ठवृत्त करनेवाळा होता हैं । ३५ ॥ । अथ शुभाशुभयुक्तचंद्रसूर्यफलम् । पापान्विते शीतरुचौ जनन्या नूनं भवेन्नैधनमामीति । ताइदिनेशः पितृनाशकर्ता मिश्रे विमिश्रे फलमत्र कुरुप्यम् ३६ शुभान्वितो जन्मनि शीतरश्मिर्यशोर्थकीर्तिविवृद्धिलाभम् ॥ गेति जातं सकलप्रदीपं श्रेष्ठप्रतिष्टं नृपगैौरवेण ॥ ३७ ॥ एकालये चेखलखेचराणां त्रयं करोत्येव नरं कुरूपम् ।। दारिद्यदुःखैः परितप्तदेहं कदापि गेहं न समाश्रयेत्सः ॥ ३८ ॥ निव मनुष्यके जम्पकळमें पापग्रहोंकर के युक्त चंद्रमा बैठा होय तौ मताको निश्चय करके नाश फरता है तिसी प्रकार पूर्व पापग्रह करके सहित हूय तौ पिताको नाश करता है अर्जेसे मिश्र फळ करता है , ३६ ॥ बीर की पंद्रमा शुभग्रहकरके सहित बैठा होय
- इ मनुष्य यश और धन कीर्तिकी वृद्धिको माप्त होता है और वह मनुष्य श्रेष्ठ प्रतिश्च
करंदै अङ्कित राजकरके मानको माप्त होताहै। ॥ ३७ ॥ जिसके एक घर में तीन पापग्रह नैते ५ मी द मनूष्य चुरे रूपबछा दारिद्य और दुःखोंकरके संनापित कभी घरमें कुछ महें न? है । ३८ ॥ इति निग्रहयोगऽध्यायः।