( २२२ ) अथ सू० चं० शु० योगफलम् सेवाविधिज्ञश्च विदेशगामी प्राज्ञः प्रवीणश्चपलोतिधूर्तः ॥ नरो भवेचंद्रमुरेंद्रवंडप्रद्योतनानां मिलने प्रमृतौ ॥ ३ ॥ निष्ठ मनुष्यके जन्मकाळमें सू. चं. . एकराशिमें बैठे होंय वह मनुष्य सेवाकी विधि ननेवाळा परदेश जानेवाळा चतुर मवीण चपळ अत्यंत धूर्त होताहै 4 ३ ॥ अथ सू० चे० उ० योगफलम् परस्वहर्ता व्यसनानुरक्तो विमुक्तज्ञकर्मरुचिर्नरः स्यात् । मृगांकपंकेरुहबंधुशुक्रश्चैकत्र भावे यदि संयुताः स्युः ॥ ४ ॥ निस मनुष्यके जन्मकाळमें सू. चं. शु. एकराशिमें बैठे हय वह मनुष्य परायधन हरने अट् व्यसनोंमें आसत सकर्मक्की रुचिसे रहित होताहै ॥ ४ ॥ अथ सू० च० श• योगफलम् । परेङ्गितज्ञो विधनश्च मंदो धातुक्रियायां निरतो नितांतम् ॥ ध्यर्थप्रयासप्रकरो नरः स्यात्क्षेत्रे यदैकत्र रवींदुमंदाः ॥ ६ ॥ जिस मनुष्यके जन्भकाछमें सू. चं. श. एकराशिमें बैठे हय वह मनुष्य पराये इंहिक बननेवा धनहीन मंदबुद्ध धतुक्रियामें निरंतर तत्पर वृथा श्रम करनेवढा होताहै ५ ॥ अथ सू० उ० ० योगफलम् । ख्यातो भवेन्मंत्रविधिप्रवीणः मुसाहसो निषुराचित्तवृत्तिः । । लज्जार्थजायात्मजमित्रयुक्तो युक्तेक्षुधार्कक्षितिजैर्नरः स्यात् ॥६॥ निस मनुष्यके जन्म|=में सू. बु. मं. एकराशिमें बैठे होंय वह मनुष्य प्रसिद्ध मंत्र आत्रकी विधिमें प्रवीण श्रेष्ट सइसी कोर चित्तवाळा छा और धन स्त्री और पुत्रमित्रसहित देता है । ६ अथ मू० सं० वृ० योगफलम्। वक्तार्थयुक्तः क्षितिपालममी सेनापतिर्नातिविधानदक्षः ॥ महामनाः सत्यवचोविलासः सूर्यार्जीवैः सहितैर्नरः स्यात्७॥ शिशु मनुष्यके अन्मकाळ’ सू. में वृ, एकस्थानमें बैठे होंय वह मनुष्य वक्ता धनसहित मनका मंत्री श्रीमझा मासिक नीति मिषनमें बतुर तेजस्व स्रत्ययोलनेवछा विकास युक्त हैं:त है } * ।
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