भाषीकासहित । ( २.११ / निस मनुष्यके जन्मकळमें बृहस्पति शनैश्चर एकराशिमें बैठे हंय यह मनुष्य वीर धनवान् ग्राम और नगरका स्वाम यशवाछ कटोंमें कुशछ सके आश्रयसे मन्दीरय ४त्र करनेवाला होता है | २० ॥ अथ शनियोगफलम् । शिल्पलेख्यविधिजातकौतुको दारुणो रणकरो नरो भवेत् ॥ । अश्मकर्मकुशलश्व जन्मनि भार्गवे रविमुतेन संयुते ॥ ३१ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक शनैश्वर एकराशिमें बैठे हय वह मनुष्य शिल्पशास्त्र और लेखन विधिमें चतुर कौतुको घोर युद्ध करनेवाछा पत्थरके हममें कुसळ अंतर है।२११ इति श्रीवंशवीस्थगौड़वंशावतंसश्रीबढ्देवमसदात्मनराजज्योतिषिकपंड़ितश्थामा छकृतायां श्यामसुंदरीभाषीकायां प्रदष्टिफळवणेनध्यायः ४ ४ = । अथ त्रिग्रहयोगाध्यायप्रारंभः।
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अथ मू० चै० मी० योगफलम् । शूराश्च यंत्राश्वविधिप्रवीणास्रपाकृपाभ्यां सुतरां विहीनाः । नक्षत्रनाथक्षितिपुत्रमिंत्रैरेकत्र संस्थैर्मनुजा भवंति ॥ १ ॥ अब त्रिग्रह योग कहते हैं जिस मनुष्यके जन्मकाढमें सू. चं. सं. एकराशिमें बैठे हय वह मनुष्य शूरवीर यंत्र और अश्वविद्याक जाननेवाछ लान और कृपःकरके हीन होता है i १ ॥ अथ सू० चै० सू० योगफलम् । भवेन्महौजा नृषकार्यकर्ता वातविधौ शास्रकटसु दक्षः । दिवामाणिसृतराश्मसंस्थैः प्रणी भवेदेकगृहं प्रयतैः ॥ २ ॥ जिस मनूष्यके अन्भयकलमें सू. चं. यु. एकराशिमें बैठे हर्षे धर मनुष्य भद्रं पशवछ रानका कार्य करनेवाला वातकरने और शास्त्रकळमें चतुर होसॉहै ॥ २ ॥