सामग्री पर जाएँ

पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/२३४

विकिस्रोतः तः
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति

भाषीटीकासहित । ( २०९ } अब गोचर करके बृहस्पतिका फल कहते हैं जन्मक बृहस्पति भथ द्वितीय धन हुनेछ पीडा चतुर्थ शत्रुवृद्धि पंचम संख्य व्या शोक सप्तम राजमान अष्टम रोग नवम मैक्रय ततः दशम मानधृदि ग्यारहवां धनछाभ बारहवां इस्पति पीड़ा करता है ॥ ४ ॥ अथ गोचरे शुक्रफलम् । रिपुक्षयं वित्तमतीव सौख्यं चित्तं सुतप्रीतिमरातिवृद्धिम् ॥ शोकं धनातिं वरवस्त्रलाभं पीडां स्वमर्थं च ददाति शुद्धः १८ ॥ अष गोचर करके शुकका फछ कह्ते हैं जन्मका शुक शनःश द्वितथमें धनलाभ तृतीयमें अनीच खौख्य चतुर्थमें धनलाभ पंचम पुत्रमानि छठे शत्रु वृद्ध सानों शोक अष्टम धनलाभ नवम अष्ठवत्र ळाभ दशम पीड़ां ग्यारहवें स्वकीय धुनळाभ बारहवें व्यय कराताहै ॥ ८ ॥ अथ गोचरे शनिफलम् । भृशं क्लेशं शं च शत्रप्रवृद्धेि पुत्रात्सौख्यं सौख्यवृद्धिं च दोषम् ॥ पीडां सौख्यं निर्धनत्वं धनातिं नानानर्थे भानुसूनुस्तनोति॥९॥ गोचर करके शनैश्चरका फल कहते हैं जन्मका कुनैपचर भष्ट करता है द्वितीयमें केश तृतीयमें कल्याण चतुर्थमें शुश्रुवुर्हि पंचममें पुर्जेसे सौख्य छठे सौख्यधृदि सप्तम ऋध अष्टम पीड़ा नवम सौख्य दशम निर्धनता । ग्यारहवें धनाभ गरहवें शनैश्चर अनेक अनर्थ करात हैं ॥ ९ ॥ अथ गोचरे राहुफलम् । हानिं नैःस्वं स्वं च वैरं च शोकं वित्तं वादं पीडनं चापि पापम्।। वैरं सौख्यं द्रव्यहानिं प्रकुर्याद्डुः पुंसां गोचरे केतुरेव ।।१०।। अत्र गोचर करके राहुका फल कहते हैं जन्मके राहुमं हानि दिनयमें धनहनन हुनेछमें धनलाभ चतुर्थमें वैर पंचभमें शोक छठे धनप्राप्ति सातवें वियद् अष्टमम पड़ नचभमें पाए दशममें एकादशमें सौख्य बाहमें धनहनि करवा है इसी तरह केतुका भ भो फड वैर जानना चाहिये ॥ १० ॥ राशौ राशौ गोचरे खेचराणामुक्तं पूर्वैर्यत्फलं जन्मराशेः ॥ तन्मयीनामेकभोत्पत्तिकानां भिन्नं भिन्नं दृश्यतेऽवश्यमेव॥११॥ शशिमें गोचर करके मुझेका फछ जो पूर्वाचार्यों ने जन्मराशिसे टेकर कह। ३ सः फ़ल एक राशिमें उत्पन्न मनुष्यको जुदा जुद देखनेमें अता है अवश्य करके इसमें इरुः कारण है ! ११ ॥ १४