( २०४ ) अतrअरष। यस्मिनृते संस्थितो वेधकर्ता पम्पः खेटः सोऽन्यभं याति यस्मिन्काले तस्मिन्मङ्गलं पीडितानां प्रोक्तं सद्भिर्नान्यथा स्यात्कदाचित् ॥ ८ ॥ इस प्रकार सर्वतोभद्र चकमें सम्पूर्ण नक्षत्र औरं राशियोंका वेध पंडितनन चिंतवन करे न शुभमहका बेचे हो तो श्रेष्ठ फळ देता है और पापग्रहोंका वेध दुष्ट फलको करता है ॥ ७ ॥ जिस नक्षत्रमें वेध करनेवाला ग्रह बैठा होय शुभग्रहं तो शुभकर्फ देता है और पापग्रह अंत्यनक्षत्रमें प्राप्त होय और वैध करता होय तो पीड़ा करते है ॥ ॥ ८ ॥ अथ सर्वतोभद्वचक्रम् । , अt. 5श्ले. --
--- - -- में, २. } च. ॥ १. | भी. १६११ औ । से. ॥ ४. | उ. फ. -- -- --
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- - -- इ.भा. ३. | मे. |-१५२७४१२ ४१४९५१ चं.ङ. १८१३ 9. भा. . —. अ. | ) चे.
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. ग. . म. १ ध. } वृश्चि. रा. ओ. स्व.
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ई. ॥ ५. | अ. ! ङ. पा. पू . था. | मृ . | नये. अथ सूर्यकालानलचक्रम् । सूर्येकालानलं चनं स्वरशास्त्रोदितं हि यत् । तदहं विशदं वक्ष्ये चमत्कृतिकरं परम् ॥ १ ॥ त्रिशूलकाभाः सरलाश्च तिस्रः किलोडैरेखः परिकल्पनीयाः॥ रेखात्रयं मध्यगतं च तत्र द्वे द्वे च कोणोपरिगे विधेये ॥ २ ॥ त्रिशूलकोण