( १९१६ ) जातकाभर अथ कुंभराशिगतगुरुफलम्। गदयुतः कुमतिर्द्रविणोज्झितः कृपणतानिरतः कृतकिल्विषः ॥ चटगते सति देवपुरोहिते कदशनो दशनोदरपीडितः ॥ ९९ ॥ जिस मनुष्यले जन्मकाळमें कुंभराशिमें वृहस्पति बैठा होय वह मनुष्य रोगसहित दुष्ट- बुद्धि धनहीन कृपणतामें तत्पर पापकरनेवाळा दुष्ट भोजनकरने दाँत और पेटमें पड़ चूक होता है । ५९ ।। अथ मीनराशिगतगुरुफलम् । नृपकृपाप्तधनो मनोन्नतिः सदनसाधनदानपरो नरः ।। सुरगुरौ तिमिना सहिते सतामनुमतोनुमतोत्सवदो भवेत् ॥६॥ । जिस मनुष्यके जन्मकाळमें मीनराशिगत वृङ्कसति बैठा होय वह मनुष्य राजाको कूपर अरजे धनको प्राप्त कामकी उन्नतिवाळा घरका सथत करनेवाळा दानमें तत्पर सत्पुरुषक प्यारा और मित्रांक संख्य देनेवाला होताहै ॥ ६० ॥ अथ मेषराशिगतभृगुफलम् । भवनवाहनचंदपुराधिपः प्रचलनप्रियताविहितादरः । यदि च संजनने हि भवेदविः कवियुतो वियुतो रिषुभिर्नरः६३॥ लिख मनुष्यके जन्मकाळमें मेषराशिमें शुक्र बैठा होय वह मनुष्य मकान, वाहनसमूह और नगरका स्वामी यात्रा मिथ आदर रहित काबियोंसे युक्त शत्रुओंकरके रहित होता है ६१. अथ वृषराशिगतत्फलम् । बहुकलत्रयुतोत्सवगौरवं कुसुमगंधरुचिः कृषिनिर्मितः । वृषगते भृगुजे कमळ भवेदविरला विरला रिपुमंडली ॥ ६२ ॥ निख मनुष्यके जन्मकालमें वृषराशिमें झुक बैठा होय वह मनुष्य बहुत सी और उत्सव तयः गौरव सहित पुष्पोंकी गंधमें रुचि जिसकी खेती करनेवाळा बहुत धनवाला थोड़े शत्रु अंमल होता है । ६२ ॥ अथ मिथुनराशिगतशुक्रफलम् । भृगुसुते जनने मिथुनस्थिते सकलशास्त्रकलामलकौशलम् । सरलता ललिता किलभारती सुमधुरा मधुरान्नरुचिर्भवेत्।६३॥ मिस मनुष्यले जन्मकछमें मिथुनराशिगत शुझ बैठा झेप वह मनुष्य सम्पूर्ण शत्रकी कzअभीि कुअक सीधी रोभायमान वाणी जिसकी मीठा खाने में रुचि जिसभी ऐसा होता ६६६
पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/२२१
दिखावट