भाषाटीकासहित । ( १९० } जिस मनुष्यके अभ्मकळमें कन्याराशिमें बृहस्पति कैठा औष वह मनुष्य पुष्पोंकी रहा और उत्तम गंध श्रेष्ठ वस्त्र करके सहित निर्माता धन और दानमें क्षुद्वािरा चिर बहुतकर्ताक शत्रुताकर करनेवाला होत है ॥ ५४ ॥ अथ तुलाराशिगतगुरुफलम् । श्रुततपोजपहोममहोत्सवे द्विजसुरार्चनदानमतिर्भवेत् । वणिजि जन्मनि चित्रशिखण्डिजे चतुरतातुरतहिततारिता ॥ जिस मनुष्यके जन्मकळमें तुळाराशिमें बृहसति बैठा हय वह मनुष्य बेद और तप, तर, हम बड़े उत्सवमेतत्पर ब्राह्मण देवताओंके पूजन और दान में वृद्धिचाल । चतुरतासइिंभ अतृर अहित करनेवाला शोंसहित होता है । ५५ ।। अथ वृश्चिकराशिगतगुरुफलम् । धनविनाशनदोषसमुद्भवैः कृशतरो बहुदम्भपरो नरः । अलिगते सति देवपुरोहिते भवनतो वनतेऽपि च दुःखभाऊ६६ निस मनुष्यके जन्मकळमें वृश्चिकराशिगत बृहसति वैठा होयै वह मनुष्य धनका र श्रे करनेवाळा दोषकरके उत्पन्न दुर्बल देव बड़ा पाखंडी भवन सथा वनरके दुः भई होता है ॥ ५६ ॥ अथ धनराशिगतगुरुफलम् । वितरणप्रणयो बहुवैभवं ननु धनान्यथ वाहनसंचयः ॥ धनुषि देवगुरौ हि मतिर्भवेत्सुरुचिरा रुचिराभरणानि च ॥५७ मिस्र मनुष्यके जन्मकाळमें धनराशिगत बृहस्पति बैक होय वह मनुष्य दान और नयन्त्र बहुत वैभव और थन वाहनसहित बुद्धिवान् श्रेष्ठ रूचिकरके सुंदरआभूषणोंवाला होता है५७ अथ मकरराशिगतगुरुफलम् । हतमतिः परकर्मकरो नरः स्मराविहीनतरो बहुरोषभाक् । सुरगुरौ मकरे विदधाति नो जनमनो न मनोरथसाधनम् ६८४ निष्ठ भनुष्यके अम्भकालमें भकरराशिगत बृहस्पति बैठक होय षह मुष्य अष्टयुद्ध परया कर्म करनेवाला काभदेवरक्षित क्रोधसहित मनुष्के कामको नाश करनेवाखा अपना मझेर सनकरनेवाला होता है । ५८ ॥ क
पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/२२०
दिखावट