( १७.: माषाटीकासहित । अथ शृणुजालयस्थे शनौ भुभदृष्टिफलम् । संग्रामकार्याभिरतं नितांतमनरुपजल्पं च महत्प्रसादम् । कुर्यान्नरं तिग्मकरस्य सूनुर्द्धसुनुद्दष्टो भृगुजालयस्थः ।। ९ ।। जिस मनुध्यकं जन्मकामें वृष तुला राशिगत शनैश्वरको मंगळ देवताहं बइ मनुष्य युद्धक काममें तपर निरंतर बहुत बोलनेवाला बडी कृपाळ होता है ॥ ९ ॥ अथ भृगुजrलयस्थे न बुधदृष्टिफलम् । कांतारतो नाचजनाङयाता विनेदद्वस्याभिरतो गतार्थः । क्लीबादिसख्यश्च भवेन्मनुष्यः श्नै सितहुं शशिसूनुद्दष्टे ॥१२ निस मनुष्यके जन्मकाळमें वृध ठूला अशीिगत शनैश्चरक बुध देवताहूय वह मनुष्य सीमें नपर नीचपुत्रका साथी विनोद और हास्समें तत्पर धनहीन हिनष्टोंसे मित्रत ! करनेवटः हृत है ।। १० ।। अथ जालयस्थ न गुरुद्दष्टफलम् । परोपकरे कृतचित्तवृत्तिः परस्य दुःखेन सुदुःखितश्च । दातोद्यमं सर्वजनप्रियश्च मेदे सितमै गुरुणा प्रहृष्टेः ॥ ११ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृध तुला राशिगत शनैश्चरको वृहस्पति देवता होय वह मनुः औग परापे उपकरमें चित करनेत्रछा परये। दुःख करके अप दुःसी दाता स्वामी होतातें ॥ ११ ॥ अथ ट्रांजलयस्थे शनौ भृगूदृष्टिफलम । रत्नादिलाभं वनिताविलासं जलधिकत्वं नृपगरवाप्तिम् । कुर्यान्नराणां तरणेस्तनूजः शुक्रेक्षितः शुक्रगृहं प्रयातः ।। १२ ।। निस मनुष्यके जन्मकालमें वृष तुला राशिगत शनैश्चरक सुत्र देबत हे वह श्य रनादिपदार्थक लाभ करनेवाळा बीके विळासमें तत्पर पानीकी अधिकतःचळ ::अस्य गौरवको प्राप्त होताहै ॥ १२ ॥ अथ बुधॐ शप्तौ रविदृष्टिफलम् ।। सुखोज्झितं नीचरतं सकोपमधार्मिकं द्रोहकरं सुर्धरम् ॥ कुर्यान्नरं तिग्मकरस्य सूनुर्भानुप्रहृष्टो बुधमंदिरस्थः । १३ ॥ निस मनुष्यके जन्भक हमें मिथुन कन्या राशिगत शनैभर पैश्च हय वे स्को स्टै छन होय यह मनुष्य सुष्ठ रहिन नीचमें तेरपर क्रोधसाहित अधर्मी र करनेत्रः ३६६ होता है ॥ १३ ॥ १२
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