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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/१६१

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जातभर अथ वृश्चिकराशिगते ने भृगुडट्फिलम् । प्रसन्नमूर्तिः समुदारकीर्तिः कूटक्रियाज्ञो धनवाहनाढ्यः ॥ कांताहतार्थः पुरुषेलियाते शीतद्युतौ दैत्यगुरुप्रहृष्टे ॥ १७ ॥ निस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकरागितचंद्रमाको शुक देखता होय वह मनुष्य प्रसन्न भूतं वदारयवाला छछछिदको जाननेवाळा धद्वहनकरके सहित नियोंकरके उम्का धन नष्ट होत= ॥ ४७ ॥ अथ वृश्चिकराशिगते चंद्रे शनिदृष्टिफलम् । स्थानभृशं दैन्यनाशात्पवित्तं नीचापत्यासत्त्वयमप्रकोपम् ॥ कुयचंद्रः सूतिकालेऽलिसंस्थश्छायापुत्रप्रेक्षणत्वं प्रयात॥४८॥ निष्ठ मनुष्पके जन्मकाछमें भृश्चिकराशिगत चंद्रमाको शनैश्चर देखताहोय वह मनुष्य स्थानभ्रष्ट झीनताका नाशकरनेवाछ थोड़े धनवाळा नीचसंतानवळा बळहम रामंयक्ष्मा रोगवाद्या होताहै । ४८ ॥ अथ धनराशिगते चंद्रे रविदृष्फिलम् । पेंढप्रतापोत्तमकीर्तिसंपत्सद्वाहनान्याहवजं जयं च ॥ नृपप्रसादं कुरुते नराणां ताराधिपधपगतोऽर्कदृष्टः ॥ ४९ ॥ निस मनुष्यके जन्मकाळमें धनराशुिगात चंद्माको सूर्य देखताहूय वह मनुष्प बड़े प्रताप कछया उत्तम यशवाळा संपदकरके सहित श्रेष्ठ वाहनोंबाळ संग्राममें यशको पनेवालारान• सहित होनौहै ॥ ५९ ॥ अथ धनराशिगते चंद्रे भौमदृष्टिफलम् । सेनापतित्वं च महात्मतापं पद्मलयालंकरणोपलब्धिम् ।। कुर्यान्नराणां हरिणाङ्ग एष शरासनस्थोऽवनिजेन दृष्टः ॥ ६० ॥ निस मनुष्यब्रे चंद्रमाको मंगछ देखताय वह मनुष्य फौजका अमऊमें धनराशिगतं माछिक बड़े तापमान ऋक्ष्मी स्थान आभूषणोंका ठाभकरनेवाळा ताहैि ॥ ५० ॥ अथ धनराशिगते चंद्रे बुधदृष्टिफलम् । सद्वाग्विलासं बहुभृत्ययुक्तं कुर्यान्नरं ज्योतिषशिल्पविद्यम् ॥ -तुरंगजं हि कुरङ्गजन्मा कुरङ्गलक्ष्मप्रभवेण दृष्टः ॥ ९१ ।। मिनुष्यके समय धनराशिगत चंबमाको नुध देखताय वह मनुष्य श्रेष्टबाणीने मिल और त नैर्वा ज्योतिषं और शिल्पविद्यक जाननेवाश्च तर्हि ॥ ५१ ॥