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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/१५७

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निधकार ( १३ २ ) मिस मनुष्यले अन्मकॉलमें सिंहराशिगत चंद्रमाको भौम देखताहोय वह मनुष्य राजाको न धन वाइन पुत्र स्वके सुखसहित होता है ॥ २५ ॥ अथ सिंहराशिगते चंद्रे युधदृष्टिफलम् । धनाङ्गनावाहननन्दनेभ्यः सुखप्रपूरं हि नरं करोति । द्विजाधिराजो मृगराजसंस्थो द्विजाधिराजारमजसंप्रदृष्टः ॥२७॥ निष्ठ मनुष्यके जन्मकळमें सिंहराशिगत चंद्रमाको बुध देखताइश ह मनुष्य धन और मी तथा वाहून पुत्रादिकोंके सुखकरके पूर्ण होता है ।। २७ ॥ अथ सिंहराशिगते चंद्र शुरुदृष्टिफलम् । बहुश्रुतं विस्मृतसाधुवृत्तं कुर्यान्नरं भूमिपतेः प्रधानम् ॥ चंद्र मृगेन्द्रोपगतोऽमरेंद्रोपाध्यायदृष्टिः परिसूतिकाले ॥ २८ ॥ निम्न मनुष्यके जन्मकळमें सिंहराशिगत चंद्रमको गुरु देखताहेय वह मनुष्य बहुश्रुत प्रभुसुनको भूलनेवाला राजाका मंत्री होता है । ॥ २८ ॥ अथ सिंहराशिगते चंद्रे भृगुडाष्टिफलम् । व्रवैभवं वै गुणिनं गुणशं प्राजं विधिजं कुरुते मनुष्यम् ॥ पीयूषरश्मिर्जुनने यदि स्यात्पञ्चननस्थो भृगुसूनुदृषुः॥२९॥ मिस मनुष्पकं जन्मकळमें सिंहराशिगत चंद्रमाके शुक देखताहय इह मनुष्य स्त्री प्रयुक्त बैभत्रमनि गुणचन गुओं का जाननेवाळा तुर विधियोंका जाननेवाला होता है॥ २९ ॥ अथ सिंहराशिगते चंद्रे शनिदृष्फिलम् ।। कांतावियुक्तः कृषिकर्मदक्षो दुर्गबिकारी हि नरोल्पकार्थः । सिंहोपयाते सति शीतभानौ निरीक्षिते सूर्यसुतेन मूतौ ॥३०॥ इस मनुष्यके जन्मकाळमें सिंहराशिगतचेङ्गम को शनैश्वर देवताहोय वह मनुष्य स्त्री रहित खेती करनेमें बतुर राणाके किछुक स्वामी थोड़े धनबाळा होता है ॥ ३० ॥ अथ कन्याराशिगते चंद्रे रविदृष्फिलम् । भुमीशाकशाधिकृतं सुवृत्तं भार्यावियुक्तं गुरुभानियुक्तम् । जातं च कन्याश्रितशीतरश्मिस्तनोति जंतूं खररश्मिदृष्टः३१॥ त्रिश्च मते मामें कन्याशीमें मां बैठा होय औ” डसन सूर्य देवताः स बह. अनके खानेका मालिक ईश्व खुलियाळा स्त्रीरहित गुरुकी भकिर्मीतत्पर होता है। ३१॥