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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/१४७

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{ १२ २ } जतंभर क्षिप्त मनुष्यके जन्मंकामें कर्कराशिमें सूर्य बैठा वयं और उस्को मंगळ देसताइय वह मनुष्य अपने बंधु बगैसे चितको दूरकरनेवाळा सूननके रोग वा भगंदर रोगकरके पोडिन होता है । २१ ॥ अथ चंद्रगृहे रवौ बुधदृष्टिफलम् ।। विद्ययशोमानविराजमानो भूपानुकंपातमनोभिलाषः । निरस्तशकूश्च बुधे न दृष्टे कर्कोटकस्थेझुमर्थे नरः स्यात् ॥२२॥ जिस मनुष्यके जन्मकछमें कर्करोशिमें स्थित सूर्यको वृध देखता हूय वह मनुष्य विद्या और यश तथा मानफ्रके क्षिराजमान राजाकी कृपासे मनको अभिळापाको शप्त शैथुओंकरके गर्हित होताहै ॥ २२ ॥ अथ चंद्रगृहे रवौ गुरुदृष्फिलम् । कुलाधिकश्चामलकीर्तिशाली भूपालसंप्राप्तमह्नपदार्थः । भवेन्नरः शीतकरतीपाते दिवामणौ वाक्पतिवीक्ष्यमाणे ॥ २३॥ निस मनुष्यके जन्मकाछमें कर्करराशीिमें स्थित सूर्यको बृहसति देखता होय वह मनुष्य अपने कुळमें श्रेष्ठ निर्मलपशवाछा राजकरके बड़े ५को साप्त होतR ॥ २३ ॥ अथ चंद्रगृहे रवौ भृशुदृष्फिलम् । स्त्रीसंश्रयाद्व्रधनोपलब्धिः परस्य कृत्ये हृदये विषादः । निशाकरागारकृताधिकारे दिवाकरे शुक्रनिरीक्ष्यमाणे ॥ २५ ॥ जिसमनुष्य जन्मकालमें कर्कराशमें सूर्य बैठाहौथ और उसको जुक देखताय तो वह मुख्य त्रीने आश्रयसे वन्न और धनको माप्तकरमेवाया और पराये काममें हृदयसे विषादपैदा अगदहे ! | २४ ॥ अथ चंद्रगृहे रवौ शनिदृष्टिफलम् । कफानिलार्तः पिशुनोन्यकार्यं स्यादंतरायश्चपलस्त्रभावः । केशी नरः शीतकरीसंस्थे दिवमणौ मंदनिरीक्ष्यमाणे ॥२८ जस्रमनुरके तत्प्रकाछमें कर्कराशिमें ये बैशा हय और उस्को शनिश्चर देखता होय दे के मनुष्य इह और नरके दुःखी और पराये कार्यंमें निंडाछनेवाळा चपळखभाव ल; भी होतड़े ५ २५ ॥