तभर
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निख मनुष्पके जन्भकाछमें उनमें केतु बैठा होय वह मनुष्य सूत्रकर्ता होताहै रोग- देने करके सहते भय से व्यसचित्र स्त्रियी चिंता टड्रगसहित बातविकार युक्तं शरीर तहै ? १ ॥ अथ धनभावस्थितकेतुफलम् । धने चोच्छखी धान्यनाशे धनं च कुटुंबाद्विरोधो नृपाद्व्याचंता॥ मुखे रोगता संततं स्यात्तथा च यदा स्वे गृहे सौम्यगेहेतिसौख्यम्२॥ निस मनुष्यके जन्मकळमें धनभावमें राहु बैठा होय वह मनुष्य धन धान्यका नाश करनेवाला कुटुंबसे घिरध करनेवाळा राजासे धनकी चिंता करनेवाला मुखमें रोग हमेशा हो और जो केतु अपनी राशिमें वा शुभग्रहको शशिमें वा नभावमें बेष्ठा होने तो अत्यंत अक्षय तौहै ॥ २ ॥ अथ तृतीयभावस्थितकेतुफलम् । शिखी विक्रभे शत्रुनाशं च वादं धनं भोगमैश्वर्यंतेजेधिकं च । भवेद्दधुनाशः सदा बाहुपीड़ा सुखं स्वोच्चगेहे भवोद्गता च॥३॥ जिस मनुष्यको जन्मकाळमें तृतीयभावमें केतु बैठा होय वह मनुष्य शत्रुओका नाश कर नेत्राळा शत्रुओंसे झगड़ा करनेवाळा धनभोग ऐश्वर्यके तेनको # अधिक प्राप्त भ्रातआ न्छ करनेवाळा हमेसा बांह में पीड़ा करनेवाला होता है और अपने उछमें केतु बैठा होय तै मुखको करना या उंबेग देता है ॥ ३ ॥ अथ चतुथभावस्थेतकेतुफलम् । चतुर्थे च मातुः मुखं न कदाचित्सुहृद्भीतः पितृतो नाशमेति । शिखी बंधुहीनः सुखं स्वोच्चगेहे चिरं नैति संधैः सदा व्यग्रता च8 निस मनुष्यके जन्मकळमें चतुर्थ भावमें केतु बैठा होय वह मनुष्य माता सुख कभी नहीं पाता मित्र और पिनासे सशको प्राप्त भत हीन होता है और जो उच्चराशिमें केतु ईश हेय दो वह पूर्वेक सम अकरके सौख्यक मात्र थोड़ा सुखी हंमेश व्यग्रचित होत३४॥ अथ पंचमभावस्थितकेतुलम् । यदा पंचमै यस्य केतुश्च जातः स्वयं स्वोद्रे धातूपातादिकष्टम् । से बंधुप्रियः संततेः स्वल्पपुत्राः सदा स्वं भवेद्वीर्ययुक्तो नरश्च । नख मनुष्यैकं भयमभारमें केलें बैठा होय यह मनुष्य अपने बदरमें क्षत और गिरने इ9 अन और भायंनेि थ:करनेवाला थोडे पुत्रवाळा हंमेशा बछसहित दंतहैि ॥ ५ ॥