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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/१३७

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६ १ १२ ) जातकाभरण दे अथ चतुर्थभावस्थितराङ्गफलम् । मुखगते रविचंद्रविमर्दने सुखविनाशनतां मनुजो लभेत् ॥ स्वजनतां सुतामित्रसुखं नरो न लभते च सदा भ्रमणं नृणाम् ४॥ क्रिस मनुष्यके चतुर्थभावमें राहु बैठा होय वह मनुष्य सुखके नाशके माप्त तजनता और मित्रध्रके सुखको महॅ माफ़ हमेशा भ्रमण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥ अथ पंचमभवस्थितराहुफलम् । गतसुखो न हि मित्रविवर्धनं क्षुदरशूलविलासनिपीडनम् ॥ खलु तदा लभते मनुजो भ्रमं सुतगते रविचंद्रविमर्दने ।। ८ ॥ निस मनुष्यकं जन्मकालमें पंचमभाषमें राहु बैशा होय वह मनुष्य सुखझौन मित्ररहित में ईंको माप्त निळसकी हानिको प्राप्त निश्चय करके श्रमके लाभ करता है ॥ ५ ॥ अथ रिपुभावस्थितराहुफलम् । शत्रुक्षयं द्रव्यसमागमं च पञ्चप्रपीडां कटिपीडनं च ।। समागमं म्लेच्छजनैर्महाबलं प्राप्नोति जंतुर्यदि षष्टगस्तमः ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें छठे भावमें राहु बैठा होय वह मनुष्य वैरियोंका नाश करने अथ धनको छाभ करता पशुओंको पीड़ा करनेवाला कभरमें दर्दको प्राप्त म्लेच्छसे समगमको प्राप्त बड़ा मॉन हृताहै | ६ ॥ अथ सप्तमभावस्थितराहुफलम् । जायानिरोधं खलु वा प्रणाशं प्रचंडपामथ कोपयुक्ताम् ॥ विवादशीलामथ रोगयुक्तां प्राप्नोति जंतुर्मदने तमे च ॥ ७ ॥ निस मनुष्यके जन्मकाछमें सातवें भावमें राहु बैटाहूय वह मनुष्य त्रसे विरोध करने बाळ भैध घीको नाश करनेवाला प्रचंडप क्रोधसहेित झगडा करनेवाली रोगसहित भः सह होता है । ७ { अथाष्टमभावस्थितरङ्गफलम् । अनिष्टनाशं खलु गुह्मपीडां प्रमेहरोगं वृषणस्य वृद्धिम् ॥ प्राणाति जंतुर्विकलारिलाभं सिंहीसुते वा खलु मृत्युगेहे ॥ ८ ॥ जिस मनुपके सन्मकाळ अष्टमभावमें भी हु बैठा होय वह मनुष्य अनिष्टनाशको प्राप्त मिश्रयकरके लिंग गुदा. ढाको प्राप्त संभहरोगाछ अंइवृद्धिसहित बिकळताको प्राप्त कैद है । ८ । {