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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/१२८

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{१०; } नस मनुष्यले दशमभासमें बुध बैठा होय वह मनुष्य ज्ञानमें बतुर श्रेष्ठ कर्म करनेवा अनेक प्रकारकी संपत्तियोंकरके संयुक्त रानमाम्य मुंद्रीलाभंकरके सहित वाणीं के बिळासमें श्रण होता है ॥ १० ॥ अथैकादशभावस्थितचूधफलम् । भोगासक्तोयंतवित्तो विनीतो नित्यानंदथारुशीलो बालिष्ठः । नानाविद्याभ्यासकृन्मानवः स्याद्याभस्थाने नंदनेशीतभानोः ११॥ निस भनुष्यके जन्पकाछमें ग्यारहें भावमें बुध बैठा होय वह मनुष्य भोगमें आसक अत्यंतं धनवाळा नम्रतासहित नित्यही आनंदको प्राप्त श्रेष्ठ शेळ बळवान् अनेक विद्याओंक अभ्यास करनेवाला होताहै ॥ ११ ॥ अथ व्ययभावास्थितबुधफलम् । दयाविहीनः स्वजनोज्झितश्च स्वकार्यदक्ष। विजितामपसः ॥ धूर्ते नितांतं मलिनो नरः स्याद्वययोपपन्नं द्विजराजसून ३२ निस मनुष्यके जन्मझळमें बारहें बुध बैठा होय वह मनुष्य द्रहित अपने जनक्रके रहित और अपने कार्यंमें चतुर और अपने पक्षको जीतनेवाळा निरंतर धूर्त और मलन होता है । १२ । अथ तनुभावस्थितगुरुफलम् । विद्यांसभेतोऽभिमतो हि राज्ञां प्राज्ञः कृतज्ञो नितरामुदारः ॥ नरो भवेच्चारुकलेवरश्च तनुस्थिते चित्रशिखंडिनै ॥ १ ॥ मिस मनुष्यकं जन्मकोंमें ळमभावमें बृहस्पात दै होय वह मनुष्य विद्याकरते सहित रानाओंका प्यारा चतुर छेतन्न निरंतर उदार सुंदर शरीरवाला होता है ॥ ५ । अथ धनभावस्थितचारुफलम् । सदूपविद्यगुणकीतयुक्तः संत्यक्तवैरोषि नरो गरीया ।। यागी सुशीलो द्रविणेन पूणों गीर्वाणवंचे द्रविणोषयाते ॥ २ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें धनभायमें बृहस्पति देता है वह मनुष्य श्रेष्ठ रूप बिया गुण यश करके सहित बैरको जोड़नेवाला त्यानी सीडमान् धनकरके पूर्ण होता है ५ २ ¥ अथ सहजभावस्थितगुरूफलम्। सौजन्यहीनः कृपणः कृतभः कांतामुतप्रीतिविवर्जतथ् । नरोग्निमांद्याबलतासमेतः पराक्रमे शक्रपुरोहितेस्मिन् । ३ ।