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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/११८

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श्रीः । अथ ख्यादिग्रहभावफलाध्यायप्रारंभः।


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-- ----- . अथ लग्नभावस्थितसूर्यफलम् । लग्नेछैल्पकचः क्रियालसतनुः क्रोथी प्रचण्डोन्नतों पामी लोचनरुक्मुकर्कशतनुः शूरो क्षमी निर्गुणःफुटाक्षःशष्टि भे क्रिये स्थितिहरः सिंहे निशधः पुमान्दारियोंपहतो विनष्टतनयः संस्थस्तुलासंज्ञिके ॥ १ ॥ निस मनुष्यके जन्मकाछमें रूममें सूर्य बैठा होय वह मनुष्य थेड़ केशव!ड़ा कम करनमें आखसी बड़ाकोधी ऊँचाशरीर खुनीक रोगसहित नेत्रोंका रोगी शूर वीर थावान निर्दय होताहै निस्के कर्कराशिवतीं सूर्य छनमें होय तो उसके कमळसरोखे नेत्र द्नेहैं और क्षेप राशिवतीं सूर्य होय तो न्यायमार्गकी स्थितिको हराकरतई और सिंहराशिवनीं सूर्य होय तो उस्को रतौंधी आती है और तुलाराशिवन सूर्य होय तो वह मनुष्य रिने पुत्रहीन होता है५। १ ॥ अथ धनभावस्थितस्रयंफलम् । धनसुतोत्तमवाहनवर्जितो हतमतिः सुजनोज्झितसौहृदः ॥ परगृहोपगतो हि नरो भवेद्दिनमोर्द्रविणे यदि संस्थितिः ॥ २ ॥ मिस मनुष्यके जन्मकाछमें धनभावमें सूर्य बैद्याय तो वह मनुष्य धन और पुल अच्छ सवारी करके रहित बुझिनष्ट मित्रतासे हीन पराये धरनें वास करता है । २ } । अथ तृतीयभावस्थितसूर्यफलम् । प्रियंवदः स्यादनवाहनाब्यः सुकर्मचित्तोनुचरान्वितश्च । मतानुजः स्यान्मनुजो बलीयान्दिनाधिनाथे सहजेधिसंस्थे/ निम्न मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे भावमें सूर्य मैठा होय तो वह मनुष्ष भीडी कोणी सुलने बाला धन औौर वाहनों करने सहित अच्छे कर्ममें मनको गानेषा नौकर करके सहित थोडे भाइयोंवाला अधिक बलवान होता है । ३ ।