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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/११७

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अकभर (९२ ) निज भक्षु थके जन्मकाळमें चंद्रमा शुक पापग्रहोंसहित द्वितीय सप्तम चतुर्थमें बैठे हय में यह मनुन वंशनाश करनेवाला होता है और केंद्रमें शनैश्चर बैठा होय बुधके देष्काणमें और दूध करके इष्ट होय तो शिल्पी होता है और जिसके बारहें बृहस्पति सूर्यके नशमें मैठ हय त यह दासी करके सहित होता है और जिसके सातवें सूर्य चंद्रभा बैठे हय । और नैदर करके दृढ होंय तो वह मनुष्य नीच होता है ॥ १५ ॥ वयो राशिंस्वनक्षत्रमेकीकृत्य पृथक्पृथक् । द्विचतुस्त्रिगुणं कृत्वा सप्तपुरसभाजितम् ॥ १६ ॥ आद्यन्तयोर्भवेदुःखी मध्ये शून्यं धनक्षयः ॥ स्थानत्रयेभ्रशेषं तु मृत्युः सार्थेषु वै जयी ॥ १७ ॥ इति श्रदैवज्ञनुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे भावो पयोगारेिष्टाध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥ उमर और रात्रि और जन्मनक्षत्र इन तीनोंके अंकोंको एकत्रित कर अळग अलग तीन जगह स्थापित करना पहिटी जगहमें दो से गुरौ, दूसरी जगहमें चारसे गुलै, और नस नगढमें तनसे गुरौ, पर्हिी जगहके गुणे अंकोंमें सातका भाग देवे और दूसरी नगर- हके अंकोंमें आर्का भाग देवे और तीसरी जगहके अंकोंमें छःक भाग देवे ॥ १६ ॥ जो पट्टेि और अंतके गुणे हुए अंकों में शून्य आवें तो दुःख कहना चाहिये और बीचके अकमें शून्य आबे तो धनका क्षय कहना चाहिये और न तीनों स्थानोंमें शून्य आवें तो उसी में मृत्यु हृन्न चाहिये और तीन जगह अंक शेष रहें तो उस वर्षमें जय कहना वह्रिये ! १७ ॥ ' इति श्रीमन्शबरेलीस्थरानज्योतिषिपंडितश्यामळालकृतायां श्याभक्षुद्री भाषाटीय भावोपयुक्तरिष्टाध्यायः ॥ २ ॥