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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/११३

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८८) जार बेकायनः । श्रीहर्नया ३ । S| सु.लं. दिवाकरेंडू व्ययबेरिया // | ता जायापती चैकविले | चनौ स्तः। कलत्रधर्मा - . सु.चं. ६ त्मज सिताक घुमा- न्भवेत्क्षीणकलत्र एव ॥ ३ ॥ निश मनुष्यको जन्मकालमें सूर्य चंद्रमा चाहें या छठे बैठे होंय तो वह स्त्री पती दोनों काण होते हैं और शो सप्तम, नवम, पश्चम भावोंमें शुक्र, सूर्य बैठे होंय तो यह मनुष्य भु होन होत है । ३ । । भसंधियाते च सिते स्मरस्थे तनौ प्रयत्नेन तु भानुसूनौ ॥ बंध्यापतिः स्यान्मनुजस्तदानीं सुतालयं नोशुभदृष्टयुक्तम्॥४॥ निस मनुष्यके जन्मकाछमें सातवें भावमें झुक राखिकी संधिमें बैठ होय और उनमें शनैश्चर बैठा होय औरं पंचमभावमें कोई शुभग्रह नहीं बैठा होय न देखता होय तैौ वह् मनु य चझस्त्रीका पति होना है ॥ ४ ॥ पुत्रहीनयोग ५ क्रूराश्च होरास्मररिःफयाताः सुतालये हीन - ( ) बलः कलावान् । एवं प्रसूतौ किल यस्य } \मं । योगो भवेत्स भार्यातनयौवहीनः ॥ ३ । ॥ जिस मनष्यके जन्मकाळमें पापग्रह छन, सप्तम, व्ययभाषमें बैठे हथ और पंदममें दूनि बी चंद्रमा बैठा होय ऐसे योगमें इयत्र की पुत्र मनुष्य करके हीन होताहै ॥ ५ ॥ पुत्रयहीनयोगः खीसँख्ययोगः ६ या यूनेकं जारौ सभृगू शश- N ॐ ॥ कादपुत्रभार्यं कुरुतो नरं हैं, तो ॥ स्यातां नृनाय- ८॥ } छ खगौ स्मरस्थौ सौम्ये- \ / क्षितौ तौ शुभदौ मृनायः ॥ ६ ॥ श. | वे/ . }