{ « } हरायाश्च निशाकराङ्गुसुतो मेऽरणे संस्थितो नानाशास्त्र कलाकलापविलसद्रत्यादिशेबीवनम् ॥दाने साध्मातं तथा विनयतां कामं धनाभ्यागमं मानं मानवनायकादविररं शीलं विशालं यदा ॥ ९ ॥ मिस मनुष्यके जन्मकाळमें छद्र वा चंद्रमासे दशममें शुझक बैठा होय वह मनुष्य अनेक शवकी कळाओंके समूहसे विछात्रवृत्तिसे आजीविका करनेवाला इन झरनेमें चाबुद उसम शलि काम करके धनको प्राप्त राना मतिष्ठा पानेवाळा श्रेष्ठ विशाळ शीळयुक्त होता’ - ९ होरायाश्च सुधाकराद्रविसुतः सृतौ खमध्यस्थितो वृत्ति हीन नरंतरस्य कुरुते काश्यैशरीरे सदा ।। खेदं वादभयं च धान्य धनयोर्दानत्वमुचैर्मनश्चित्तोद्वेगसमुद्भवेन चपलं शीलं च नो निर्मलम् ॥ १० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें उनसे वा चंदमासे शनिश्चर दशम वैद्यः दोष तो वह मनुष्य हीनवृत्ति करनेवाला दुर्बळ र्हैं खेदयुक्त विवाद करनेवाला धन धन्य करके हील मछिन चित्तमें उदेग पैदा होने चपळ शीळ निर्मल नहीं होताहै ॥ १ सूर्यादिभिव्योमचरैर्विलग्नादिंदोः स्वपाके क्रमशो विकल्प्या । अर्थोपलब्धिर्जनकाज्जनन्याः शत्रोर्हिताद्धातृकलत्रभृत्यात् ११॥ निस मनुष्यके जन्मकाछमें कुल या चंद्रमासे सूर्य दशममें बैठा हो तो पिता से धनलाभ कहना और चंद्रमा दशममें होय ते मातासे धनाभ कहना चाहिये और मंभ दशममें बैठा होय तो शत्रुसे धनळाभ कहना बुध दशभमें बैठा होय ते मित्रसे धनलाभ का और बृहस्पति भाईसे धमळाभ कहना होय तो स्वसे धनटाभ कहना और होय तो शुक शममें शनिश्चर दुममें होय तो नौकरसे धनलाभ कहना चाहिये ।। ११ । खीन्दुललास्पदसंस्थितांशे पतेस्तु वृत्या परिकल्पयेत्तस् । सदौषधोणीदितृणैः पुंवणैर्दिवामागीधैत्तिविषं विदध्यात् ।।१२।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य, चंद्रमा, ऊन इन तीनोंमें जो बी होय उस दश्षभाः। में जो नवांशका उदय होय उस मवांशपतिसे 'वृतिका विचार करना आहिये जो दक्षभस्ि त नवांशपति सूर्य होय तो श्रेष्ठ औषधी और ऐ, वृष संव यें करके कि कहना ११." =
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