( ८२ आतभर रेत्र शुभदाः स्खोचाधिपाः सर्वदा कुर्युर्भाग्यमलाघवेति वि बला दुःखोपलब्धि पराम् ॥ ३ ॥ जन्म उनसे व चंद्रमासे जो नवमस्थान है वह भाग्यभाव कहता है न नवमभाव स्वामी करके मुक्त व दृष्ट होंय त उसका अपने देशमें भाग्येद्य होता है और नो नवमभावको शुभग्रह देखते हय और अपना स्वामी न देता होय तो उसका भाग्य परदैछमें उदय होताहै और जो भाग्येश अपने उच्चमें होय तो उसका हमेशा भाग्योद्य होता है और जो भास्यसबका नामी निर्बल होय और भाग्यभावको पापी ग्रह देखते होंय तो दुःखसे भाग्यकी माप्ति है । ३ । होती | भाग्येश्वरो भाग्यमतोऽस्ति किं वा सुस्थानगः सारविराजमानः । भाग्याश्रितः कोस्ति विधायें सर्वमत्यल्पमल्पं परिकल्पनीयम् ४ जो नवमभावक स्वामी नवममें बैंड होय अथवा केंद१।४७१०। त्रिकोण५९में बैठ हेय तो बंह भयघन होता है नवमेके बछाबळसे अधिक सम न्यून भाग्य कहना चाहिये? अथ भाग्यवद्योगः । भग्धवंग ५ शै. | तमुत्रिसुनूपगतो ग्रहवेद्यो वाधिवीया नवमं { प्रपश्येत । यस्य प्रसूतौ स तु भाग्यशाली हैं । विलासशीलो बहुलार्थयुक्तः ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्पकाछमें छम, पंचम, तीसरे ग्रह बँटे हयश, और आधेक बछ करके नवम भावक हुँचते हय तो वह मनुष्य!L+--- भःयन् विछासमें शीळयाळा बहुत धन करके सहित होता है ॥ ५ ॥ छावतंसयोगः ६ ॥ चेद्भाग्यगामी खचरः स्वगेहे सौम्येक्षितो | ६* यस्य नरस्य सुतौ ॥ भाग्याधिशाली स्वकु १ लावतंसो हंसो यथा मानसराजमनः ॥ ६ ॥ ६ ४ ८ ५ जिस मनुष्यले अश्मक छिमें जो भाग्यभवनमें अपने घरका ग्रह ४' +} हा होय और गुंभश्रद्द करके दृष्ट दोष तो वह मनुष्य माम्यवान् अस्त्रे कुसुममें प्रवक्षमनन होता है जैसे इंख मानससरोवरमें मुख पातहै । ६ ।
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