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जातकपद्यते— ( २० ) द्वादशशखण्डकः । [०१०२०३०४/०५/०६०७०८०९१० |१११२ o | ७ | 0 | 9 | 0 |o ० { ० || 6 | | 0 | b || ० ० ० } ० | ||४७|| || | |{ | Y ( २१ ) विषमराहौ त्रिंशांकृतयः । ( २२ ) समर।ौ त्रिंशांशपतयः। श. . उ. } . शु. | बु. ऋ. | श. सं. ( २३ ) स्रप्तगेश्वरचक्रम् । | श में | चू | शु| धृ | चं अ श | | अमि ! श | ओ श | श. j अ' या | | न | ३ स्व १ध असि | खम | अमि | स } ओं | खु .मं स्व | सं | खम भ म सम | मि | श स्व भमि | सम श्र न श . मि स्लम मि । मि. | द्व | || २ | व | इव | मि अभि | श ओमि | मि स्त्र | इव | स्व } अमि | मि । ५ । श भम्र षड्वर्गास्तु बृहज्जाकाद्विप्रसिद्ध थेवास्ति सप्तांशुनाद धाराः संक्य कल्याणवर्मा-मेषाडिमिथुनमृगइरिभोनतुश्चवृषभषापराः । फंड षटभूकन्यापूर्वी खप्तमशानमिव ।