व्यद्यदुहरंणदीषिकसहत । ३७ नैकयोगार्श्वस्थाने तद्धातमूलं स्वल्पान्तरत् स्वीकृतं वधेथा यदि चेव -चेव + ठब ( चेइ + उस ) चेवXऽत्र २४चेव x sघ _२ चेष/चेचXडम =$/चेच « उव २चेब वस्तुतो बढयोगार्धमेवेष्टम , बछनैकयोर्धसेव कष्टं खमुचितम् । अत एव दैवज्ञदिवाकरेण प्रौढमनोरमायां ‘अथवा बछगणैमिष्टं तदूनं रूपं कष्टमिति निष्५न्नम् । मूलरूपेष्टकष्टस्तु पराशरादिमुनिमत विरुद्धत्वादयुकत्वादुपेक्ष्यमेवेति बोद्धव्यम्” इयुक्तम् । किञ्च तद्बहु समतस्यान्नाङ्गीकुर्वते खाम्प्रतिका इति । तथा प्रहस्य शुभफलं शुभबGशुभदृष्टिवशाद्देवं चशुभबछशुभटुष्टि वशवछुभफटं भवितुमर्हयत एवेष्टसुष्टभ्यां पृध इंगबळे गुणिते तदा द्वये कृते इत्यपि समुचितमेवेत्युपपनं खर्चम् ॥१३॥ भ७--पूर्व साबित चेष्टाबल को १ से शुना करके १ एक जोड़ने से चेष्टा रश्मि, तथा उच्च चाल को ६ से गुना करके १ जोड़ने से उस्ररश्मि होता है। चेष्ट बक को उच्चघळ से शुना कर उसका मूळ इष्ट होता है । तथा चेष्टाब को एक १ में घटवे और उच्चत्रक को १ में घटाकर देने का घात करके गुणनफल का मूल दृष्ट होता है । और इष्ट कष्ट के अनुरूप ही श्रों का दशकळ होता है (अर्थात् इट अधिक हो तो शुभ फळ की अधिकत और कष्ट अधिक हो तो अशुभ फल की अधिक यदि इष्ट कष्ट तुल्य हो तो शुभाशुभ भी हुल्य ही होता है) ग्रहों के षड्वौष को इष्ट से गुना करने से इष्टघठ और कष्ट से शुना करने से फटबछ होता है । और इष्ट से दृष्टि को गुन करने से इष्ट दृष्टि तथा कष्ट से गुन करने से कष्ट दृष्टि होती है ॥१२॥ च०डी०-वेश्चेष्टाबळ ०० । २१ । ८७ इदं षभिक्षुणितम् २ । ०६ ।४२ मैकम् ३।०६।४२। अत चेष्टोच्चबछानयने त्यक्तम्तिमाययचं गृहीत्व थवि षडभिठूयते तदत्रभिसमवयवो रुषाधिको भवस्य रश्वेष्टारस्मयः३०६ । ४३ एवं सर्वेषां चेष्टोच्च बळलि त्यक्तन्ति सवयवसहितान्येव षभिर्यनीति दिक् । द्र० ५० वक्रम् । एवं वेकडचबळे षभिर्गुणिते चेकै चोडधरश्मयो ज्ञाः ५ । ५। ५५ एवं जगंधा । “ ५१ चम् ।
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