व्याख्याहरणदीपिकामुहिता । १९ क"
-- ~~ ~या = आरप एव । वळघ द प्रभेथे अहे नीचोन प्रहः षड्भाधिकः श्व भगणः सच्युतः षड्भाल्पो प्रहसनीचखमो भवितुमर्हत्य" नीचोनो भगण उच्युत: षडधिक' युतं सयुक्तिकसेव । दशधने सर्वोत्5ष्ठस्त्रदृषमितं पूर्ण बढं, ततः क्रमपचयेन मूछत्रिकोणौ तारतम्यात् त्रिचरणादिबलं स्वछुतमायैरित्युपपन्नम् ।। ५ ।। भा०- स्पष्ट प्रद्द में अपने नाचको घटावे यदि ६ राशि से अलग हो तो उसमें ६ का भाग देने से, यदि ६ राशि से अधिक हो तो उसको १२ राशि में घटाकर शेषमें ६ का भाग देनेसे उस ग्रहका उच बळ देता है । अपनी राशि में दो चरण, समको शशि में, अष्टमांश, मूलत्रिकोण में तीन चरण, मित्रकी श|मेिं एक चरण, अधिमिश्रकी राशिमें त्रिगुणित आश्वमांd, शङ्की शिमें षोडशांश, भविशत्रुको राशिमें बीसवाँ भाग बल होता है। इसी प्रकार ग्रहों के सप्तवर्गेज बक ग्रहादि सप्तवर्गके स्वामीके वयसे ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् प्र€ जिसके वर्गों में हो। वह मित्र शत्रु आदिमें जो दो वही बस ग्रहण करे । विशेष—जो राशि वगृह और मूळत्रकोण दोन होता है, अथवा उच्च,स्वगृह और त्रिकोण तीनों होता हो तो अज्ञाँ कौन बल आइप करना चाहिए इस विषके (नर्णय में सरवलके वचन उदाहरण (२४) चक्र में लिखा है देख ॥५॥ ६९ ई०--अत्र यत् प्रहाण/मुख नचविभाग कुइजातके - ‘थजधृषभमृगाङ्गनाकुडीरा झषवण औौ च द्धाि इरादतुः। शिखिमनुयुतिश्चन्द्रयांशैस्तुनवकविंशविभश्च तेऽरतनचाः ।। अत्र सूर्यः १०।१२।५७ १ ३८ अस्य नचम् ६१० नोचनः सूर्यः ४।२५७३० षड्भरपराधश-ोघेतऽतः षड्भकछब्धं शून्यम् ९० शेषम् ४/ २५/३० षष्ठ्य संपुण्थ बस्वस्थानीयइरेण विभज्य लगधमु पयुपरं संयोज्य जातम् २४५/२७३ षड्भक्तळवधं ४० शेषम् ५२०३० पुनः षष्ट्या संगुष्य स्वस्वरेण विभज्य ज। राधयद्धािनयम ३५४॥ ‘३ घभधम् ५९ अतः रवेः रूपायुधधम् ००/४०५९ एवं स्रवं याम् । द्र° १४ पकम् । अथ निखरॉमत्रचमशत्रवः १५ चत ५ ज्ञेयाः किमत्र लेख प्रयायेन । ताडिझने त्राtमत्रझनर्थे तु-- धन्योन्यस्य धनव्ययायसहजव्यापारबन्धुस्थिवा स्तकाले सुहृद् इति ।” अथात्र जेंद्रितया भौमः चतुर्थे शुद्धः, दुशमश्चन्द्रः एकादशः शुकः ,